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चार महीनों के लिए बंद हुए मांगलिक कार्य

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अमर उजाला ब्यूरो
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हरिद्वार।
सोमवार से चार महीनों के लिए विवाह आदि मांगलिक कार्यों पर विराम लग गया है। इन चार महीनों में विष्णु, गणपति और दुर्गा की पूजा होती रहेगी। मांगलिक यज्ञ, हवन, अनुष्ठान और विवाहों का कोई भी मुहूर्त 31 अक्तूबर तक नहीं है। इन दिनों यज्ञोपवित भी नहीं हो पाएंगे।
शास्त्रीय दृष्टि से देवशयनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। ज्योतिषाचस्त्रत्तर्य डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार यज्ञोपवित, गर्भाधान आदि के लिए मुहूर्त नहीं होंगे। इन चार महीनों में विवाह श्रेष्ठ नहीं होता। ऐसे विवाहों मे तमस और अहंकार की प्रवृत्ति हावी हो जाती है। करीब पांच हजार व्यक्तियों का अध्ययन करने के बाद भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी की अनुसंधान कर्ता तथा विश्वविद्यालय की छात्रा पूनम गौड़ ने पाया कि जो विवाह देवशयन के बाद चार महीनों की अवधि में होते हैं, उनमें से अधिकांश जीवनभर अशांत ही रहते हैं। इन चार महीनों में विवाह आदि के संस्कारों को ज्योतिष में प्रतिकूल कहा गया है।
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डा. मिश्रपुरी ने बताया कि विष्णु शयन के बाद शिव पूजा, गणपति पूजा, सूर्य पूजा, गंगाजल पूजा, पितृतर्पण, दुर्गा पूजा आदि पर कोई नियम लागू नहीं होता। पितरों का आह्वान किया जा सकता है। इसी प्रकार हरिशयनी एकादशी के दिन नक्षत्र, वार, करण और योग का विचार नहीं किया जाता। यह एकादशी किसी भी नक्षत्र में पड़ सकते हैं।
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शास्त्रीय दृष्टि से विष्णु को यज्ञों, मुहूर्तों, आजीविका, प्रज्ञा, प्रजा पालन, विवाह, पुत्र जन्म, नामकरण आदि संस्कारों का प्रमुख देवता माना गया है। सृष्टि के त्रिदेवों में ब्रह्मा निर्माण, विष्णु पालनहार और शिव संहारकर्ता माने गए हैं। जब विष्णु का शयन हो जाता है तब सृष्टि के पालन के सभी सूत्र कम हो जाते हैं। 33 कोटि देवों में विष्णुशयन प्रमुख है। अन्य देवों का शयन नहीं होता। सृष्टि पालन की सभी शक्तियां विष्णुशयन के बाद शिव में केंद्रित हो जाती हैं।
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