शिक्षक और गुणवत्ता के बगैर देश के टॉपर संस्थानों में उत्तराखंड के संस्थान कैसे आएंगे। संस्थानों के नेशनल इंस्टीट्यूशन रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की रैंकिंग में पिछड़ने के पीछे उच्च शिक्षा की बदहाली है। कुछ सुधारों के बावजूद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हालात बेहद बदतर हैं। विश्वविद्यालयों में न फैकल्टी हैं और न ही इंफ्रास्ट्रक्चर। नियमावली शासन की फाइलों में धूल फांक रही है। आलम यह है कि ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालय केवल जुगाड़बाजी के दम पर चल रहे हैं।
संविदा के भरोसे विवि
प्रदेश के सरकारी विश्वविद्यालय केवल संविदा के शिक्षक व कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं। अकेले तकनीकी विवि में ही 50 से ज्यादा संविदा के कर्मचारी काम कर रहे हैं। एचएनबी मेडिकल यूनिवर्सिटी, श्रीदेव सुमन विवि, उत्तराखंड आयुर्वेद विवि, हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री विवि में तो न पूरे शिक्षक हैं और न ही स्थायी कर्मचारी।
नैक का ठिकाना नहीं
प्रदेश के विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता का पिछड़ापन इस कदर है कि चुनिंदा संस्थानों के पास ही नेशनल असेसमेंट एंड एक्रिडिएशन काउंसिल (नैक) का ग्रेड है। ज्यादातर संस्थान नैक के पैमानों पर ही खरे नहीं उतरते।
इतने विवि फिर भी नतीजा ऐसा
उत्तराखंड में सात राष्ट्रीय महत्व के संस्थान : आईआईटी रुड़की, आईआईएम काशीपुर, एनआईटी रुड़की, एम्स ऋषिकेश, एफआरआई देहरादून, आईजीएनएफए देहरादून और आईएमए देहरादून
एक केंद्रीय विवि-(गढ़वाल विवि)
11 राज्य विवि : जीबी पंत विवि, कुमाऊं विवि, संस्कृत विवि, दून विवि, मुक्त विवि, तकनीकी विवि, आयुर्वेद विवि, हॉर्टिकल्चर विवि, श्रीदेव सुमन विवि, एचएनबी मेडिकल विवि, आवासीय विवि), तीन डीम्ड विवि (एफआरआई, गुरुकुल कांगड़ी विवि, ग्राफिक एरा विवि
15 प्राइवेट विवि : देव संस्कृति विवि, डीआईटी विवि, ग्राफिक एरा हिल विवि, हिमगिरी जी विवि, इक्फाई विवि, आईएमएस विवि, मदरहुड विवि, एसआरएचयू विवि, भगवंत ग्लोबल विवि, पेट्रोलियम विवि, पतंजलि विवि, उत्तरांचल विवि, हिमालयन गढ़वाल विवि, एसजीआरआर विवि, क्वांटम विवि हैं।