ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून।
कांग्रेस की जन चेतना रैली में जुटी भीड़ का नजारा तब कुछ और ही होता यदि जनपद के सभी बड़े नेता बराबर की ताकत लगाते। रैली में जुटी भीड़ को लेकर आयोजक बेशक उत्साहित हैं, मगर कहीं न कहीं उनमें सामूहिक कोशिशों के अभाव की कसक भी है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर हाईकमान के औपचारिक एलान के बाद प्रीतम सिंह के नेतृत्व में सोमवार को पार्टी का यह पहला बड़ा कार्यक्रम था। इसकी तैयारियों का दारोमदार वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना और प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट के कंधों पर डाला गया। जिस दिन प्रीतम ने धस्माना को रैली का संयोजक बनाया, महानगर कांग्रेस के कई नेताओं ने नाक मुंह सिकोड़ लिए। लेकिन प्रीतम के फैसले को मानने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था। लिहाजा वे चाह कर भी कार्यक्रम से किनारा नहीं कर सके। कांग्रेस में एक वर्ग रैली को प्रीतम के कद और पद से जोड़कर देख रहा था तो दूसरा वर्ग इस बात से आशंकित था कि कहीं रैली का सारा श्रेय धस्माना न ले उड़ें। इसलिए रैली में भागीदारी तो हर नेता की ओर से ही हुई मगर अधूरे मन से। पार्टी के भीतर ही कुछ नेता दबी जुबां यह कहते दिखे कि सब ताकत लगाते तो रैली में जुटी भीड़ दोगुनी होती। रैली के संयोजक सूर्यकांत धस्माना की निगाहों में आयोजन सफल और पार्टी की अपेक्षाओं के अनुरूप रहा। मगर सच यह है कि इस शो में सामूहिक प्रयास नजर नहीं आए। पार्टी के वरिष्ठ नेता नवप्रभात नजर नहीं आए। पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिष्ट की गैरमौजूदगी के बारे में कहा गया कि वह पत्नी की बीमारी की वजह से शामिल नहीं हुए। पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल ने शिरकत की, लेकिन जिस कद और दमखम वाले वह नेता माने जाते हैं, उनके समर्थकों की ओर से वो दमखम रैली में नहीं दिखा। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय रैली में आए जरूर लेकिन उनकी भूमिका भी पार्टी नेतृत्व के रिस्पांस के हिसाब से जस को तस वाली रही। रैली में ज्यादा प्रयास करने वाले जिन नेताओं की चर्चा थी, उनमें राजपुर रोड के पूर्व विधायक राजकुमार और गोदावरी थापली के नाम प्रमुख हैं।