ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
डीएलएड में एक बार प्रवेश देने के बाद राज्य सरकार परीक्षा और दोबारा प्रवेश प्रक्रिया कराना भूल गई है। इससे भविष्य में होने वाली टीचर भर्ती में युवा ढूंढने मुश्किल हो जाएंगे।
उत्तराखंड बोर्ड ने वर्ष 2016 में डीएलएड की प्रवेश परीक्षा से 13 डायट में 650 सीटों पर दाखिले किए थे। दो साल का यह कोर्स वर्ष 2018 में पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन हाल ही में इस कोर्स के तीसरे सेमेस्टर के पेपर कराए गए हैं। इस बीच सरकार ने तीन साल में दोबारा डीएलएड की प्रवेश परीक्षा नहीं कराई। ऐसे में अगर प्राइमरी, अपर प्राइमरी के टीचर की भर्ती निकलती है तो डीएलएड कर रहे युवाओं के सामने संकट की स्थिति हो जाएगी। आसन्न टीचर भर्ती के लिए बीएड की बजाय डीएलएड करना अनिवार्य है।
बहरहाल पहला बैच पासआउट नहीं हुआ है और इसके बाद कोर्स के लिए प्रवेश परीक्षा भी नहीं कराई गई है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की बात करें तो हर साल डीएलएड के प्रवेश होते आ रहे हैं। अभी नई प्रक्रिया शुरू होने जा रही है।
बता दें, बीएड, डीएलएड, चार वर्षीय आईटीईपी जैसे कोर्सेज के संचालन को लेकर सरकार का रवैया काफी सुस्त है। बीएड पर पहले से रोक लगी हुई है। अब आईटीईपी की मान्यता पर भी रोक लगा दी गई है।
क्या होता है डीएलएड
दरअसल, प्राइमरी और अपर प्राइमरी में शिक्षण के लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) का कोर्स शुरू किया था। कई राज्यों ने सरकारी डायट और निजी कॉलेजों में इस कोर्स के संचालन की अनुमति दी थी जबकि उत्तराखंड में केवल डायट में इन कोर्स के संचालन की अनुमति दी गई थी।
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सरकार में बैठे अधिकारियों की नासमझी की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में लगातार इस तरह की परेशानियां पेश आ रही हैं। अधिकारियों ने उत्तराखंड को प्रयोगशाला बना दिया है, जहां नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं।
-डॉ. सुनील अग्रवाल, अध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ सेल्फ फाइनेंस इंस्टीट्यूृट