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52 परिवारों ने 15 साल में 10 हेक्टेयर भूमि पर उगाया जंगल

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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर।
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एक ओर जहां जंगलों का अंधाधुंध कटान कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वहीं, जनजाति बाहुल्य चकराता के ठाणा गांव के ग्रामीण पर्यावरण प्रहरी बनकर उभरे हैं। गांव के 52 परिवारों ने पिछले 15 वर्षों में बंजर हिस्सों में बांज के पौधे रोपकर 10 हेक्टेयर क्षेत्र को हरा-भरा बना दिया है।
ग्रामीणों ने पेयजल संकट और क्षेत्र में घटती हरियाली देख खुद ही मुहिम छेड़ी। उन्होंने मृदा एवं भूमि संरक्षण विभाग से पांच बार मिट्टी का परीक्षण कराया। उसके बाद श्रमदान कर बंजर जमीन पर बांज के पेड़ लगाने शुरू किए और उनके संरक्षण का जिम्मा भी उठाया। ग्रामीणों की गांव को हरा-भरा करने की मुहिम अब रंग लाने लगी है। वर्तमान में 80 फीसदी से अधिक जंगल तैयार हो चुका है। जबकि, शेष पौधे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं।
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जंगल की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों ने चारों ओर कंटीले तार लगाए हैं। साथ ही जंगल की सुरक्षा के लिए एक चौकीदार भी तैनात किया है, जिससे पेड़ों को जानवरों से बचाया जा सके। इसके अलावा जंगल को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति से पांच हजार रुपये अर्थदंड वसूलने की व्यवस्था भी की गई है। ग्रामीण हृदयराम जोशी, आनंद जोशी, माया दत्त जोशी, अर्जुन दत्त, अजवीर चौहान ने बताया कि गांव में रहने वाले 52 परिवार पिछले डेढ़ दशक से पहाड़ी पर बांज के पौधे रोप रहे हैं। गांव में बांज का जंगल पनपने से भविष्य में पेयजल संकट से निजात मिलने के साथ ही क्षेत्र में जैव विविधता विकसित होने की उम्मीद जगी है।
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बांज के पेड़ की उपयोगिता
बांज को उत्तराखंड का हरा सोना कहा जाता है। इसकी सूखी चौड़ी पत्तियों का आवरण जमीन को धूप से बचाने के साथ ही बारिश के पानी को तेजी से बहने से रोकता है। इससे पानी को जमीन के अंदर रिसने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। इसी के चलते बांज के जंगलों के आसपास वाले क्षेत्रों में ठंडे पानी के बारहमासी प्राकृतिक स्रोत मिलते हैं। बांज की पत्तियां जमीन में गिरकर दबती और सड़ती रहती हैं, इससे मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में प्राकृतिक खाद का निर्माण होता है।
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सिर्फ हरा-भरा जंगल तैयार करना ही हमारा लक्ष्य नहीं है। इस जंगल का संरक्षण भी हम मिलकर पूरे मनोयोग से कर रहे हैं। - श्रीचंद जोशी, ग्रामीण
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हमने खुद ही श्रमदान कर बंजर जमीन को हरा-भरा करने की जो मुहिम छेड़ी थी, वह रंग लाने लगी है। हम चाहते हैं कि अन्य गांवों के लोग भी इससे प्रेरणा लें। - सालकराम जोशी, ग्रामीण
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पर्यावरण प्रदूषण को देखते हुए हर क्षेत्र में जंगल उगाए जाने की जरूरत है, जिससे कि भविष्य की पीढ़ी को खुशहाल और स्वस्थ जीवन दिया जा सके। इसी उद्देश्य से ठाणा के ग्रामीणों ने गांव की बंजर जमीन को हरा-भरा करने की ठानी। - सुंदर दत्त जोशी, पूर्व प्रधान
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