ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर
धूमसू जौनसारी जनजाति सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था और संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित गायन, वादन, नृत्य एवं नाट्य विधा की तीन दिवसीय कार्यशाला का शनिवार को समापन हो गया। कार्यशाला में युवाओं को पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण दिया गया।
स्वरांजलि संगीत विद्यालय भीमावाला में आयोजित कार्यशाला में धूमसू मंच की निर्देशक शांति वर्मा तन्हा ने कहा कि उत्तराखंड के संगीत में प्रकृति का वास है। यहां के गीत, संगीत की जड़ें प्रकृति से जुड़ीं हैं। समय के साथ यहां के गीत संगीत धूमिल होने लगे हैं, पुराने लोक वाद्य यंत्रों की जगह नए वाद्य यंत्रों ने ले ली है। इसके चलते युवा पीढ़ी अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों से दूर होती जा रही है।
कार्यशाला में 50 प्रतिभागियों को उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों ढोल, दमाऊ, हुड़की, रणसिंगा, विणाई, ढौंर थाली, मोछंग, मसकबीन, बांसुरी का प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान सभी प्रतिभागियों ने पारंपरिक वाद्य यंत्रो का वादन कर वाहवाही लूटी। कार्यशाला में फिल्म लेखक व रंगकर्मी विशाल नैथानी ने कहा कि लोक वाद्यों में आंचलिक संस्कृति की छाप होती है। इन वाद्य यंत्रों का संस्कृति विशेष के जन जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने युवाओं को विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले रागों की जानकारी मुहैया कराई। इस मौके पर प्रशिक्षक सिन्ना राम, प्रेमदास, रमेश चंद, मीना वर्मा, ईशा चौहान, रितिक चौहान, शुभम नौटियाल, अमृत धीमान, वेदांश, ईशा छेत्री, साक्षी, नेहा, सूरज तोमर आदि मौजूद रहे।