पर्वतीय क्षेत्रों का मरोज पर्व आज
ब्यूरो/अमर उजाला
मसूरी। जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर, जौनपुर और रवाईं में प्रतिवर्ष नए साल के दूसरे सप्ताह में मनाए जाने वाले मरोज पर्व का इंतजार अब खत्म हो गया है। रविवार को पूरे जौनपुर विकासखंड में मरोज पर्व मनाया जाएगा, जिसको मनाने के लिए अधिकांश प्रवासी अपने घर पहुंच गए हैं।
मरोज पर्व मनाने के पीछे कई किवदंतियां हैं। प्रमुख किवदंती के अनुसार, जौनसार बावर, जौनपुर व रवाईं के निवासी स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं। इसलिए हर एक गांव में सामूहिक चौक में पांडवचौंरी बनी हैं जिसमें पांडवों के हथियारों के प्रतीक रखे होते हैं। प्रत्येक त्योहार में इनकी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने जब द्रौपदी को जुआ में हार दिया था और दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने की कोशिश की थी तो भरी सभा में द्रौपदी ने अपने केश खोलते हुए प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वह दुशासन के वक्ष के रक्त से अपने केश नहीं धो लेंगी तब तक वह अपने केश की वेणी नहीं गूंथेंगी। इसलिए मरोज में दुशासन रूपी बकरे को माघ महीना शुरू होने से एक दिन पहले काटा जाता है। घर की मुखिया महिला इस दिन व्रत रखती है और परिवार द्वारा बकरा काटे जाने व पूजा अर्चना करने के बाद अपने केशों की वेणी गूंथती है। मरोज के दिन अधिकांश घरों में बकरे या खाडू काटे जाते हैं। कटे बकरे के मीट को टुकड़े कर के घर के अंदर रस्सी से लटका दिया जाता है और पूरे महीने इसका सेवन किया जाता है। अपने रिश्तेदारों व जिन बेटियों की शादी हो चुकी होती है, उनको माघ के महीने में विशेष तौर पर बुलाकर उनकी खातिरदारी की जाती है।
दूसरी मान्यता के अनुसार इन दिनों काश्तकारी के काम से काश्तकार निपट चुके होते हैं और इन दिनों ठंड भी बहुत होती है। इसलिए शरीर को दुरुस्त रखने और ठंड से बचने के लिए मीट व घरों में बनाई गई अनाज की मदिरा का सेवन कर मनोरंजन किया जाता है। मरोज के दिन रात्रि भोजन करने के बाद सभी ग्रामीण एक दूसरे के घरों में जाते हैं और पूरी रातभर नाच-गाना होता है। क्षेत्र के प्रवासी लोग मरोज मनाने के लिए अपने गांवों को लौटते हैं।