श्रीनगर। गढ़वाल के केंद्र बिंदु में स्थित राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में जले हुए मरीजों के इलाज के लिए बर्न यूनिट नहीं है। कॉलेज में प्लास्टिक सर्जन का पद ही सृजित नहीं है। यहां सिर्फ मामूली रुप से जले मरीजों का ही उपचार होता है। अन्य को रेफर कर दिया जाता है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर पौड़ी, टिहरी, चमोली व रुद्रप्रयाग जिले का केंद्र बिंदु है। कॉलेज मेें अकसर अन्य स्थानों से जले मरीज यहां आते हैं। यदि मरीज 20 से 30 फीसदी तक जला हो, तो उसका उपचार सर्जरी वार्ड में हो जाता है, लेकिन इससे ज्यादा गभीर रुप से जले हुए मरीजों का इलाज नहीं हो पाता है। पूर्व में कॉलेज से संबद्ध बेस अस्पताल में बर्न यूनिट की स्थापना की गई थी, लेकिन जरूरी स्टाफ और संसाधनों की कमी की वजह से यह बंद हो गई।
यहां बता दें कि बर्न यूनिट आईसीयू के समान पृथक वार्ड में संचालित होती है, क्योंकि जले हुए रोगी के संक्रमित होने का खतरा होता है। संक्रमण रोकने के लिए उसे बहुत ही सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। गंभीर रुप से जले हुए मरीजों का उपचार प्लास्टिक सर्जन ही करते हैं। साथ ही यहां बर्न केस के लिए प्रशिक्षित स्टाफ तैनात होता है। उक्त सारी सुविधाएं मेडिकल कॉलेज में नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सीएम रावत ने बताया कि संस्थान में प्लास्टिक सर्जन का पद सृजित नहीं है। सामान्य रुप से जले हुए मरीजों का उपचार यहीं हो जाता है। ज्यादा जले मरीजों को रेफर करना मजबूरी है।
टिहरी जिले में नहीं है बर्न यूनिट
नई टिहरी। पौड़ी जिले के कफोलस्यूं पट्टी में एक छात्रा के ऊपर पेट्रोल छिड़ककर आग लगाने जैसी घटनाओं से निपटने के लिए जिलास्तर पर उपचार की कोई व्यवस्था नहीं है। आग से किसी व्यक्ति को नुकसान होने पर जिला अस्पताल के सामने प्राथमिक उपचार के बाद हायर सेंटर रेफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जिला चिकित्सालय बौराड़ी के सीएमएस डा. यतेंद्र सिंह ने बताया कि बर्न यूनिट देहरादून में कोरनेशन हॉस्पिटल के अलावा पहाड़ में कहीं भी नहीं है। उन्होंने बताया कि ऐसे केस आने पर यहां प्राथमिक उपचार देकर रेफर करना पड़ेगा। किसी व्यक्ति के 20 फीसदी से अधिक जल जाने पर उसके इलाज के लिए बर्न यूनिट की जरूरत पड़ती है।
वार्ड में पर्दों के सहारे रखा जाता है मरीज को
देहरादून से मांगा गया इनपुट
कर्णप्रयाग और थराली में नहीं वर्न यूनिट
कर्णप्रयाग। क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में कहीं भी वर्न यूनिट नहीं है। हालांकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में वर्न यूनिट होनी चाहिए। बावजूद विभाग इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कर्णप्रयाग में घाट, गैरसैंण सहित पिंडर घाटी के मरीज पहुंचते हैं। लेकिन यहां जले हुए मरीजों के लिए अलग से रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां मरीज को वार्ड में ही पर्दों के सहारे रखा जाता है। अस्पताल में न जले हुए मरीज को अलग से रखने के लिए न कोई वार्ड है और ना ही वेंटीलेटर सहित अन्य उपकरण। वहीं गैरसैंण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और थराली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी वर्न यूनिट नहीं होने से लोगों को दिक्कतें उठानी पड़ती है। कर्णप्रयाग सीएचसी के प्रभारी चिकित्साधीक्षक डा. हरीश थपलियाल ने बताया कि जब कभी वर्न केस आते हैं तो उन्हें सतर्कता पूर्वक रखा जाता है। ताकि किसी प्रकार का कोई संक्रमण न हो। वहीं गैरसैंण के चिकित्साधीक्षक डा. मनीभूषण पंत ने बताया कि अस्पताल में आइसोलेशन वार्ड तो है लकिन वर्न यूनिट नहीं है।
लक्ष्मी प्रसाद कुमेड़ी
जारी-
जिला अस्पताल में स्थापित है वर्न यूनिट
गोपेश्वर। चमोली जिले में गोपेश्वर में स्थित जिला चिकित्सालय में वर्न यूनिट स्थापित की गई है। जबकि कर्णप्रयाग, गौचर, पोखरी और जोशीमठ में वर्न यूनिट नहीं है। जिससे आग से झुलसे मरीजों को हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है। सीएमओ डा. तृप्ति बहुगुणा ने बताया कि जोशीमठ और कर्णप्रयाग में वर्न यूनिट स्थापित करने के लिए निदेशालय को प्रस्ताव भेजा गया है।