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सात समंदर पार की जैनी बनीं रामणी गांव की लाडली बिटिया

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गोपेश्वर। 15 वर्ष पहले सात समंदर पार से चमोली के रामणी गांव पहुंची जैनी लोगों की लाडली बिटिया बन गई है। इंग्लैंड की जैनी चाइल्ड एजूकेशन पर शोध करने वर्ष रामणी गांव आई थीं और अब यहीं की होकर रह गई हैं। वह साल में कम से कम दो बार परिवार के साथ रामणी गांव आती हैं। मधुरभाषी व सरल स्वभाव के कारण जैनी गांव की लाडली बन गई है। जैनी रामणी गांव को अपना दूसरा मायका मानतीं है।
वर्ष 2003 में इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की शोध छात्रा जैनी को ह्यूमन नेचर एंड चाइल्ड डेवलपमेंट (मानवीय प्रकृति और बाल विकास) विषय पर शोध करने भारत आने का मौका मिला। उसने शोध कार्य के लिए उत्तराखंड राज्य को चुना। यहां कई गांवों का भ्रमण करने के बाद वह रामणी गांव पहुंचीं। यहां की आवोहवा जैनी को इतनी भायी की वह यहीं की होकर रह गईं। जैनी का शोध कार्य वर्ष 2015 में पूरा हो गया है, लेकिन वह आज भी एक बेटी की तरह सालभर में दो-तीन बार अपने मायके (रामणी) गांव जरूर आती हैं और कुछ दिन यहां रहने के बाद वह फिर इंग्लैंड लौट जाती हैं। मायके से उन्हें ढेर सारा प्यार और कलेउ भेंट के तौर पर यहां की महिलाएं देती हैं। जैनी अपने शोध के लिए बच्चों के साथ जंगल से लेकर मवेशियों के साथ गईं। वह खेतों में भी जाती थीं ताकि बच्चों के व्यवहार का सही आंकलन कर सकें। यही वजह है कि जैनी की यहां के बच्चों और महिलाओं से गहरा लगाव हो गया है। वर्ष 2009 में जैनी की इंग्लैंड के क्रेग जैफरी से शादी हुई और अब उनके दो बच्चे भी हैं। मौजूदा समय में जैनी ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। वह इस वर्ष वह बच्चों को लेकर भी रामणी गांव पहुंचीं।
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रामणी गांव के मकर सिंह नेगी का कहना है कि जैनी का शोध कार्य तीन साल पहले पूरा हो गया था, लेकिन वह अभी भी रामणी गांव पहुंचती हैं। यहां होने वाले धार्मिक व अन्य समारोह में शामिल होने के लिए भी आती हैं। कल्पेश्वरी देवी कहती हैं कि जैनी हमारी बिटिया की तरह है। जब वह यहां आई थीं तो वह 25 साल की थी। आज वह 40 साल की हो गई हैं। वह सालभर में दो बार अपने मायके रामणी गांव आना नहीं भूलती। हम उन्हें भेंट में कलेउ भी देते हैं।

कोट
जब 2003 में रामणी गांव आई थीं तो यह क्षेत्र मेरे लिए नया था, लेकिन यहां की महिलाओं और बच्चों के प्यार के बीच ऐसा लगता है कि जैसे यहां से सदियों का नाता रहा होगा। रामणी गांव अब मेरे लिए दूसरा मायका है। यहां के बच्चे रचनात्मक प्रतिभा के धनी हैं। - जैनी, इंग्लैंड निवासी।

जैनी ने बनवाया था क्षेत्र में पहला शौचालय
गोपेश्वर। वर्ष 2003 में रामणी गांव में एक भी शौचालय नहीं था। जब इंग्लैंड से जैनी रामणी गांव पहुंची तो उसने देखा ग्रामीण गदेरों और खेतों के किनारे शौच के लिए जाते थे। यह देख जैनी ने लोगों को शौचालय बनवाने के लिए प्रोत्साहित किया साथ ही लोगों को स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा। अब ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों में शौचालय बनवा लिए हैं।
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रामणी गांव में रहते हैं 180 परिवार
चमोली जिले के घाट ब्लॉक का करीब 180 परिवारों का रमणीक गांव है रामणी। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह गांव सदियों से ही सैलानियों के मध्य आकर्षण का केंद्र रहा है। देश-विदेश के सैलानी प्रतिवर्ष क्षेत्र में सैर-सपाटे के लिए पहुंचते हैं।
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