कर्णप्रयाग। सिद्धपीठ चंडिका मंदिर समूह सिमली पौराणिक होने के बावजूद तीर्थाटन के नक्शे पर स्थापित नहीं हो पाया है। हालांकि सात वर्ष पूर्व यहां पशुबलि रोकने के एवज में तत्कालीन प्रशासन ने मंदिरों को पर्यटन और तीर्थाटन के नक्शे से जोड़ने की बात कही थी। इस पर ग्रामीणों ने यहां पशु बलि बंद कर दी, लेकिन मंदिर आज भी तीर्थाटन के नक्शे पर स्थापित नहीं हो पाए।
तहसील मुख्यालय से छह किमी की दूरी पर पिंडर नदी किनारे सिद्धपीठ चंडिका मंदिर समूह का मंदिर है। मंदिर परिसर में पौराणिक शैली के बने चंडिका देवी मंदिर, महिषमर्दिनी, दक्षिण काली, शिव और गोलगोविंद गुणसाईं (भगवान विष्णु) के मंदिर हैं। चंडिका देवी जाख, सिमली, सेनू, कोली, पुडियाणी, सुंदरगांव, गैरोली सहित आस पास के गांवों की आराध्य देवी हैं। इसे सिद्धपीठ माना जाता है। यहां देवी को पहले ग्रामीण पशु बलि के रूप में अष्टबलि देते थे, लेकिन सात वर्ष पूर्व यहां प्रशासन और शांति कुंज की पहल पर पशुबलि को बंद कर दिया गया। देवेंद्र सिंह नेगी, जयदीप गैरोला, नत्था सिंह, गोपी डिमरी आदि का कहना है कि चंडिका देवी मंदिर में बारह माह देश विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन यह मंदिर समूह तीर्थाटन के नक्शे पर स्थापित नहीं हो पाया है। दूसरी ओर विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी का कहना है कि गैरसैंण के लोहवागढ़ी, कर्णप्रयाग का दशोलीगढ़ सहित सभी पौराणिक महत्व के मंदिरों को पर्यटन और तीर्थाटन के सर्किट में स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।