श्रीनगर। वातावरण में एरोसोल (सूक्ष्म धूल के कण) की मौजूदगी कैंसर का कारण बन रही है। गढ़वाल विवि में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने यह बात कही। एरोसोल पर चर्चा के बाद इस दौरान एरोसोल से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभावों पर शोध पत्र पढ़े गए।
गढ़वाल विवि के चौरास परिसर स्थित लोक संस्कृति प्रेक्षागृह में भौतिकी विभाग की ओर से उत्तराखंड के एरोसोल (सूक्ष्म धूल के कण), वायु गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सोमवार को आइआइटीएम के वैज्ञानिक डा. एसडी पंवार ने आकाशीय विद्युत के एरोसोल पर प्रभाव के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि जिस स्थान पर आकाशीय विद्युत आघात की संभावना रहती है, वहां पेड़ के नीचे खड़ा नहीं रहना चाहिए। इससे विद्युत आघात का खतरा बढ़ जाता है। श्रीराम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च दिल्ली के डा. पवन कुमार भारती ने अंटार्कटिका में शोध के दौरान मिले अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि जिन स्थानों पर मानवीय हस्तक्षेप कम हैं, वहां प्राकृतिक अनुकूल बना हुआ है। बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर ग्वालियर के डा. एसके भटनागर ने कहा कि वातावरण में एरोसोल की वजह से फेफड़ों के कैंसर हो रहे हैं। जबकि आरआरसीएटी इंदौर के डा. एसके बर्त्वाल ने नैनो फिजिक्स पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य में भविष्य में नैनो प्रौद्योगिकी बेहतर संसाधन उपलब्ध कराएगा। वहीं डा. अभिजीत चटर्जी ने दार्जलिंग में ब्लैक कार्बन से संबंधित शोध प्रस्तुत किया। इस अवसर पर डा. भटनागर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।