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भक्ति से मन की स्थिरता संभव : आचार्य ममगाईं

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भक्ति से मन की स्थिरता संभव : आचार्य ममगाईं
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ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
ऋषिकेश। मन और शरीर की क्रियाओं में समन्वय से ही व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। मन की वृत्ति चंचल होती है। इसे स्थिर और शांत करने के लिए भक्ति नितांत आवश्यकता है।
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ये बातें कथावाचक आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं ने बुधवार को रायवाला स्थित बनखंडी महादेव मंदिर में पौराणिक देवभूमि सोसायटी की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में कहीं। आचार्य ने कहा कि मानव शरीर एक ऐसा मंदिर है, जिसके बाहर विशाल संसार है और अंदर परमात्मा का वास। मनुष्य का मन रूपी द्वार निरंतर संसार की ओर देख रहा है। यदि उसमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न किया जाए, तो फिर जीव को परमात्मा के आनंद की झलक दिखाई देती है। परमात्मा प्राणी मात्र के अंत: स्थल में विराजमान है जो हमारा मूल स्वरूप है। इस दौरान उन्होंने पुराणों और वेदों में वर्णित आत्मज्ञान का वर्णन भी किया। धार्मिक अनुष्ठान में सोसायटी के अध्यक्ष आचार्य सुमन धस्माना, डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल, शूरवीर सिंह पंवार, कैप्टन आनंदमणि तिवारी, सतीश रावत, स्वर्णलता धस्माना, जगमोहन चौहान, मुकेश नेगी, राजीव पंवार, विमला रावत, सुषमा तिवारी, ऊषा गौनियाल, मीरा बिष्ट, विजयलक्ष्मी बडोनी, प्रकाश भट्ट, रजनी पोखरियाल, सुरेश जोशी आदि मौजूद रहे।
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