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हिंदी साहित्य के पुरोधा को किया नमन

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ब्यूरो/अमर उजाला/विकासनगर।
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पछवादून विकास मंच ने साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद्र के जन्मदिवस पर उनके चित्र पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। पुस्तक प्रदर्शनी के माध्यम से उनके साहित्य में अविस्मरणीय योगदान को याद किया गया।
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय लक्खनवाला में आयोजित कार्यक्रम में मंच के संयोजक अतुल शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही ग्राम में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद्र का वास्तविक नाम धनपत राय था। उन्हें बचपन से ही कहानी सुनने और लिखने का शौक था। इसी शौक ने उन्हें महान कहानीकार और उपन्यासकार बना दिया। उन्होंने बाल पुस्तकें भी लिखी। हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने कहानी और उपान्यास के माध्यम से लोगों को साहित्य से जोड़ने का कार्य किया। उनके उपन्यास और कहानियां आज भी प्रांसगिंग है। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में 15 उपान्यास, 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, सात बाल पुस्तकें और 20 अनुवाद लिखे। इस मौके पर सुरेश पाल, मुकेश राज शर्मा, मनोज राठौर, ऊषा रानी, शाहिदा, रजनी, चौधरी सुनील तोमर, संजीव गुप्ता, नवीन वर्मा राकेश कुमार, अरविंद आदि मौजूद रहे।
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वहीं, मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिवस पर साहित्यकार हेमचंद्र सकलानी ने कहा कि जब भी कहानियों, उपन्यासों का जिक्र होता है तो उससे पहले प्रेमचंद्र को याद किया जाता है। उन्होंने माधुरी, हंस जैसी पत्रिकाओं के संपादन के साथ ही गोदान, गबन, कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि जैसी उपन्यास कृतियों के साथ ही शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, नमक का दरोगा, दो बैलों की जोड़ी, ईदगाह जैसी कालजयी रचनाएं भारतीय साहित्य जगत को दी। उनके उपन्यासों में ग्रामीण भारत का सजीव चित्रण दिखता है। उनके साहित्य के बिना भारतीय साहित्य अधूरा है।
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