ब्यूरो/अमर उजाला
साहिया। करीब 100 साल के बाद चालदा महासू देवता की पालकी ने सोमवार को कोटा तपलाड़ में प्रवेश किया, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। हजारों लोग इस देव पल के साक्षी बने। अब अगले दो साल तक देव पालकी गांव में ही प्रवास करेगी।
करीब तीन दिनों तक 120 किमी की पैदल दूरी तय कर सोमवार को देव पालकी नराया गांव से कोटा तपलाड़ पहुंची। दोपहर तीन बजे जैसे ही देव पालकी ने गांव में प्रवेश किया। पूरा गांव चालदा महासू के उद्घोष से गूंज उठा। लोगों ने मंदिर में देव पालकी के दर्शन कर सुख और समृद्धि की कामना की। ढोल-दमाऊ की थाप पर शंख-घड़ियालों की ध्वनि के बीच पुजारियों ने देव पालकी का स्वागत किया। देव पालकी को कंधा देने के लिए लोग आतुर नजर आए। लोगों ने देव पालकी पर पुष्प और चावल बरसाए। शाम करीब पांच बजे वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच देव पालकी ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया। देर शाम तक गांव में उत्सव जैसा माहौल रहा। भंडारे में प्रसाद गृहण कर लोगों ने धर्मलाभ कमाया। अब अगले दो साल तक देव पालकी गांव में ही प्रवास करेगी।
इस मौके पर कोटा तपलाड़ मंदिर के पुजारी टीकाराम जोशी, नंदराम जोशी, प्रताप सिंह तोमर, खत बम्टाड़ चालदा महासू के बजीर सूरत सिंह चौहान, दिनेश चौहान, खजान सिंह, भगत सिंह बिष्ट, गुमान सिंह, शांति सिंह, मायाराम, सरदार सिंह, खत सिलगांव के बजीर तुलसीराम शर्मा, खत अटगांव के दीवान सिंह तोमर, बुद्धसिंह तोमर, जयपाल सिंह तोमर, अमर सिंह चौहान, दिगंबर सिंह, दीवान सिंह भंडारी, बलबीर सिंह, जयपाल, बचन सिंह चौहान, सूर्यपाल चौहान, विजय सिंह, गुलाब दास, घनश्याम, पूरन सिंह, शमश्ेार सिंह, कुंवर सिंह बिष्ट, ज्ञान सिंह राय, अर्जुन नाथ, राजुगरु, प्रसाद सिंह चौहान, राकेश, भगत सिंह तोमर, चंदन सिंह, चमन सिंह, जालम सिंह चौहान, सियाराम पंवार आदि मौजूद रहे।
उल्लेखनीय है कि देवता के लिए हाल ही में ग्रामीणों ने देवदार की लकड़ी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। हिमालयी संस्कृति को खुद में समेटे हुए यह मंदिर काष्ठ कला का बेजोड़ नमूना है। मंदिर की दीवारों पर कई देवी-देवताओं की कलाकृतियों को उकेरा गया है।