देवप्रयाग। आधुनिकता के भौतिकवादी युग में सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। त्योहारों को मनाने के तौर तरीके भी बदलने लगे है, लेकिन भरपूर पट्टी के दनाड़ा गांव के बुजुर्ग आज भी अपनी परंपराओं व रीति रिवाजों को नहीं भूले हैं।
गांव के बुजुर्गों ने बैसाखी (विखोत) का त्योहार अपनी वर्षों पुरानी रीति रिवाज व परंपरा के अनुसार मनाया। बैसाखी के दिन सारे ग्रामीण ढौर थाली बजाते हुए जंगल गए और वहां से हल्दू का पेड़ लेकर गांव लौटे। गांव में बुजुर्गों ने पंचायत चौक में देवी का ध्वज गाढ़ कर व हल्दू की पौध का रोपण किया। इसके बाद पूजा अर्चना की गई। साथ ही गांव की महिला व पुरुषों ने सामूहिक रूप से टोली बना कर पारंपरिक तरीके के साथ चौफल्या व थड्या गीत गाए, जिसमें लौ ठंडो पाणी बांजे की जड़ी को..जैसे गीतों के माध्यम से जन जागरूकता का पाठ भी पढ़ाया। ग्रामीणों का मानना है कि इस त्यौहार के आगाज से ही पूरे बैसाख के महीने में विभिन्न स्थानों पर मेलों का आयोजन शुरू किया जाता है। इस आयोजन में बुजुर्ग प्रताप सिंह, मुरारी सिंह, जगतराम, मनोहर सिंह, विसंबर, गुलाब सिंह आदि शमित ग्रामीण शामिल थे।