ब्यूरो/अमर उजाला/साहिया।
मौसम की बेरुखी ने काश्तकारों को बेहाल कर दिया है। कम बारिश होने से मटर की फसल सूखने की कगार पर पहुंच गई है। मंडी में काश्तकारों को फसलों का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। उन्हें अपनी फसलों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ रहा है। फसल के बीज का दाम तक निकलाना मुश्किल लग रहा है।
साहिया और आसपास के क्षेत्रों में मटर की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। मार्च और अप्रैल में मटर की फसल पक कर तैयार हो जाती है। जिसकी दिल्ली, सहारनपुर, लुधियाना, मुज्जफरनगर, देहरादून, बरेली आदि की मंडियों में खासी डिमांड रहती है। लेकिन इस साल सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बारिश होने से जमीन की नमी पूरी तरह से गायब हो चुकी है। जिसका सीधा असर फसल की ग्रोथ पर पड़ रहा है। कई इलाकों में फसल सूखने की कगार पर पहुंच गई है। बीते साल जहां काश्तकारों ने 30-40 रुपये किलो तक फसल को बेचा था। वहीं इस साल उन्हें यह फसल 15-20 रुपये प्रति किलो की दर से बेचनी पड़ रही है। नेवी गांव के सियाराम शर्मा का कहना है कि इस साल उन्होंने बैंक से लोन लेकर फसल बोई थी, लेकिन बारिश न होने से उनकी मेहनत बेकार हो गई है। उन्हें बीज की लागत तक निकालना मुश्किल लग रहा है। बैंक का लोन चुकाने का संकट खड़ा हो गया है। पानुवा के रूपराम राठौर का कहना है कि बारिश न होने से मटर के साथ ही अदरक, गागली, आलू, हरि मिर्च की नगदी फसलें भी सूखने की कगार पर पहुंच गई है। बोहरी गांव के किसान रण सिंह चौहान ने बताया कि उन्होंने सोचा था कि मटर की फसल बेच कर जो रकम मिलेगी उससे गेहूं का बीज खरीदेंगे, लेकिन पर्याप्त सिंचाई न होने से फसल उम्दा नहीं हो सकी। अब उन्हें यह फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ रही है। काश्तकार परम सिंह, महेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, इंदर सिंह आदि का कहना है कि काश्तकारों का कृषि ऋण माफ होना चाहिए।
20 दिन पूर्व जो क्षति आंकलन की रिपोर्ट भेजी गई थी। उसमें फसलों को महज 10 प्रतिशत नुकसान का अनुमान था। अब दुबारा से सर्वे कराया जा रहा है। जिसके बाद ही फसल के नुकसान का सही आंकलन हो सकेगा। - वीके तिवारी, एसडीएम, कालसी