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करोडो खर्चने के बावजूद गंगा मैली की मैली

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ब्यूरो/ऋषिकेश। शास्त्रों में पतित पावनी मां गंगा व उसके तटों पर जिन क्रियाओं को वर्जित रखा गया है, वह व्यवहार में खूब अपनाई जा रही हैं। यही वजह है कि राष्ट्रीय नदी के संरक्षण और उसे प्रदूषण मुक्त रखने के लिए अकेेले तीर्थनगरी में ही अब तक सीवरेज आदि योजनाओं पर करोड़ों खर्च हो चुके हैं, मगर अब तक नदी में मैला गिरने का सिलसिला नहीं थम पाया। तीर्थनगरी में गंगा में बरसाती नालों-खालों के जरिए तो गंदगी गिर ही रही है, नदी में नगर निकायों व समीपवर्ती गांवों से निकलने वाले नालों के जरिए दूषित जल मिल रहा है, जिसके रोकथाम की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो पाई है। गंगा के आसपास बने कई होटलों, आश्रमों व भवनों से भी मोक्षदायिनी में मैला गिराया जा रहा है। इसकी मॉनिटरिंग व रोकथाम के भी कोई इंतजाम नहीं हैं।
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केंद्र सरकार यहां तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय से वर्तमान में नरेंद्र मोदी के समय तक सीवर जलोत्सारण के नाम पर करोड़ों की योजनाएं स्वीकृत कर चुकी है, मगर नतीजा सिफर रहा। ढाई दशक बीत जाने के बाद भी यहां नदी में गिर रहे नालों की रोकथाम और ड्रेनेज सिस्टम पर गौर नहीं किया गया। कई श्रद्धालु साबुन का इस्तेमाल कर गंगा स्नान कर रहे हैं, तो कई स्थानों पर नदी के तटों को धोबी घाट बना दिया गया है। अक्सर श्रद्धालु नदी में डुबकी लगाने के बाद पुराने वस्त्र नदी में ही फेंक देते हैं। नदी में इस तरह की गतिविधियों की निरंतरता से लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। मगर गंगा को मैला करने वाले इन कारकों की रोकथाम व निगरानी की बात तो दूर लोगों को जागरुक करने के लिए तक नदी तटों पर नोटिस बोर्ड नहीं लगाए गए हैं।

ब्रह्मांड पुराण में गंगा तट पर वर्जित 13 क्रियाएं
पुराणों के मुताबिक गंगा में मल त्याग करना, प्रक्षालन, पानी छोड़ना, वस्त्र फेंकना, प्रयुक्त फूलों को चढ़ाने के लिए फेंकना, मैल को रगड़ना, खेलकूद करना, दान स्वीकार करना, अश्लीलता, नदी में निस्पंदन, तैराकी करना, शरीर में साबुन लगाना, शवों को फेंकना आदि वर्जित हैं।
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...और सरकार ने नहीं पढ़ा ब्रह्मांड पुराण
ऋषिकेश। वर्ष 2004 में संसद की एक स्थायी समिति ने गंगा नदी में प्रदूषण पर गंभीर चिंता जताते हुए सरकार से इसे रोकने को ब्रह्मांड पुराण पढ़ने की सलाह दी थी। पर्यावरण व वन मंत्रालय संबंधी संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गंगा की सफाई के लिए ब्रह्मांड पुराण में 13 क्रियाएं वर्जित की गई हैं। लिहाजा सरकार को अपने सफाई मानकों में इन क्रियाओं को शामिल करना चाहिए। मगर इसके बाद अब तक बनी सरकारों ने गंगा स्वच्छता के नाम पर योजनाएं बनाकर करोड़ों रुपये तो खर्चे मगर न तो पुराण का अध्ययन किया और न ही उसमें उल्लिखित बातों को धरातल पर उतारने की जहमत ही उठाई।
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- गोमुख से गंगासागर तक नदी तट पर लगभग 31 करोड़ की आबादी निवासरत है।
- गंगा में दो करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित जल /कचरा प्रतिदिन प्रवाहित होता है।
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