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लड़कर लेंगे, भिड़कर लेंगे, राजधानी गैरसैंण लेंगे

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गैरसैंण। राज्य आंदोलन में बढ़चढ़कर भागीदारी करने वाले चिह्नित राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि 9 नवंबर 2000 को अलग राज्य बना तब सोचा की अब इस पहाड़ी प्रदेश का भला हो जाएगा। यहां विकास के नाम पर हर सुविधा होगी तो यहां के नौजवानों को रोजगार के साधन आसानी से मुहैया होंगे, लेकिन हालात अविभाजित प्रदेश से उलट रहे। वर्ष 2014 में गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन ने आशा की किरण जगाई, लेकिन गैरसैंण को राजधानी का नाम देने पर सरकारों का ढुलमुल रवैया एक और आंदोलन को जन्म दे गया। आंदोलनकारियों ने दोहराया कि राज्य आंदेालन की भांति लड़कर लेंगे, भिड़कर लेंगे राजधानी गैरसैंण लेंगे..।
राज्य आंदोलनकारी धूमा देवी का कहना है कि गैरसैैंण उत्तराखंड आंदोलन की आत्मा रही है। इसी को केंद्र मान कर समूचे पर्वतीय जन मानस ने लड़ाई लड़ी थी। सत्ताधीशों को इस लड़ाई में दी गई आहुति को नहीं भूलना चाहिए। हम लड़कर, छीन कर गैरसैंण को राजधानी बनवा कर ही दम लेंगे। उत्तराखंड की मातृ शक्ति को फिर से आगे आना होगा और पुन: अपनी शक्ति का लोहा मनवाना होगा।
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सुरेश कुमार बिष्ट का कहना है कि प्रदेश की स्थायी राजधानी गैरसैंण का मुद्दा कोई नया नहीं है। पर्वतीय क्षेत्र के केंद्र बिंदु गैरसैंण को राज्य की राजधानी के रूप में आम जन मानस ने इसे स्वीकार किया है। पूरन सिंह नेगी का कहना है कि स्थायी राजधानी के लिए आंदोलन की जो ज्योति जली है, हम इसे मुकाम हासिल होने तक बुझने नहीं देंगे। राजधानी के लिए एक बार फिर राज्य आंदोलनकारी बलिदान देने को तैयार है। रामचंद्र गौड़ का कहना है कि सरकार ने ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के लिए मन बना लिया है। स्थायी राजधानी के लिए गंभीर मंथन किए जाने की जरूरत है। वैसे भी एक छोटे से राज्य में दो राजधानियों का कोई औचित्य नहीं है। सरकार को वही करना चाहिए जो सबके हित में हो।
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