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...तो चुनौतीपूर्ण होगा दावानल का सामना करना

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जंगलों को आग से बचाने की होगी चुनौती
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- कम बारिश और बर्फबारी से क्षेत्र के जंगलों की नमी हो चुकी है गायब
- वनाग्नि से निपटने के लिए गोष्ठियां आयोजित कर लोगों को जागरूक करने में जुटा विभाग
अमर उजाला ब्यूरो
त्यूनी।
दावानल के हिसाब से यह साल वन विभाग के लिए खासा चुनौतीपूर्ण साबित हो सका है। सर्दियों में कम बारिश और बर्फबारी के चलते क्षेत्र के ज्यादातर जंगलों की नमी पूरी तरह से गायब हो चुकी है। ऐसे में अब जब तापमान बढ़ेगा तो दावानल की घटनाएं भी बढ़ेंगी। विभागीय अधिकारी भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि इस फायर सीजन उन पर काम का दबाव ज्यादा रहेगा। उन्हें वनाग्नि से निपटने के लिए खासा मशक्कत करनी पड़ सकती है। फिलहाल, वनाग्नि पर समय रहते काबू पाया जा सके। इसके लिए इन दिनों विभाग व्यापक स्तर पर जगह-जगह गोष्ठियां आयोजित कर लोगों को जागरूक करने के काम में जुटे है।
हर साल फरवरी माह शुरू होते ही फायर सीजन की भी शुरुआत हो जाती है, जो जुलाई माह तक जारी रहता है। इस समयावधि में तापमान अधिक होने के कारण वनों में दावानल की घटनाएं खासा बढ़ जाती हैं। कई हेक्टेयर में फैले जंगल पूरी तरह से स्वाह हो जाते हैं। बीते साल भी दावानल से कई हेक्टेयर में खड़े जंगल स्वाह हो गए थे। ऐसे में इस साल अब जब सर्दियों में नाम मात्र की बारिश और बर्फबारी हुई है तो फायर सीजन के दौरान विभाग की मुश्किलें बढ़ना लाजमी है।
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150 अति संवेदनशील कंपार्टमेंट चिन्हित
वनाग्नि से निपटने के लिए चकराता वन प्रभाग ने भी तैयारियां तेज कर दी है। वन प्रभाग 50 हेक्टेयर भू-भाग में फैले हुआ है। जिसमें देवदार, चीड़, कैल, बांझ, बुंराश जैसे बेशकीमती पेड़ों की भरमार है। इस साल वन प्रभाग ने पूरे क्षेत्र में करीब 150 अतिसंवेदनशील कंपार्टमेंट को चिन्हित किया है। आग पर काबू पाने के लिए प्रभाग अंतर्गत 27 क्रू स्टेशन और दो कंट्रोल रूम का निर्माण किया गया है। इसके साथ ही रामपुर मंडी, रिवर रेंज और कनासर में तीन वॉच टॉवर बनाए गए हैं। समय रहते सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सके इसके लिए 42 मोबाइल, 27 वायरलैस और 50 हैंडसेट का बंदोबस्त किया जा रहे है। समय रहते फायर लाइन को काट आग पर काबू पाया जा सके। इसके लिए 105 श्रमिकों को तैयार किया जा रहा है। इसके साथ ही 14 बेस स्टेशन और एक रेपीड स्टेशन का निर्माण किया गया है।

10 साल में स्वाह 26350 हेक्टयर जंगल
हर साल वनाग्नि से कितना नुकसान होता है। इसका अंदाजा महज इससे लगाया जा सकता है कि वर्ष 2007 से 2017 तक दावानल की 35 घटनाओं में 26350 हेक्टर वन संपदा खाक हो चुकी है।

सर्दियों में तीन बार सुलगा जंगल
अब तक जनवरी माह में ही तीन बार वन प्रभाग के जंगल सुलग चुके हैं हालांकि, आग के कारणों का पता नहीं चल सका। लेकिन लोगों का कहना है कि कमी नमी के चलते ही तीनों बार आग ने विकराल रूप धारण किया।
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कम बारिश और बर्फबारी के चलते इस फायर सीजन में विभाग की मुश्किलें बढ़ सकती है। दावानल की घटनाओं में कमी आ सके। इसके लिए इन दिनों व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
- सुबोध काला, उप प्रभागीय वनाधिकारी, चकराता
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