दशकों से नहीं खिसकी घंटाघर पर लगी घड़ी की सुई
-- देखरेख न होने के कारण बदहाली के आंसू बहा रहा है घंटाघर
अमर उजाला ब्यूरो
ऋषिकेश। शहर की पहचान माने जाने वाला घंटाघर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। वजह है नगर निकाय प्रशासन की लापरवाही। दरअसल, देहरादून रोड पर गोपाल सिंह की स्मृति में वर्ष 1928 में घंटाघर का निर्माण किया गया था। घंटाघर की देखरेख को लेकर निकाय प्रशासन के उदासीन रवैए ने इस धरोहर को हाशिए पर ला खड़ा कर दिया है। यहां कई वर्षों से घंटाघर पर लगी घड़ियों की सुईयां जाम पड़ी हैं, जिन्हें सुचारु करने की जहमत निकाय के अधिकारी नहीं उठा पा रहे हैं। इस बाबत स्थानीय सामाजिक संगठन कई दफा निकाय से लिखित व मौखिक रूप मांग कर चुके हैं, मगर कोई गौर करने वाला नहीं है।
क्षेत्रीय विधायक व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल भी शहर की पहचान घंटाघर के प्रति उदासीन भरा रवैया अख्तियार किए हुए हैं। वह लगातार तीसरी बार क्षेत्र के विधायक हैं। बावजूद इसके उन्होंने इस धरोहर की स्थिति जानने व घंटाघर की दशा सुधारने पर शायद ही कभी गौर किया हो। घंटाघर की बिल्डिंग के कमरों में कई लोग वर्षों से जमे हैं। निगम प्रशासन ने अनधिकृत रूप से कमरों में जमे लोगों को हटाना मुनासिब नहीं समझा। जबकि अन्य स्थानों पर निगम का रवैया इसके उलट देखने को मिलता है। वहीं, बिल्डिंग में संचालित लाइब्रेरी भी धूल फांक रही है। मगर निगम प्रशासन को इसके जीर्णोद्घार की भी कोई सुध नहीं है।
क्या कहते हैं स्थानीय नागरिक
नगर निकाय ने कभी घंटाघर की जीर्णशीर्ण हालत पर ध्यान नहीं दिया है। अब नगर निगम का गठन हो चुका है। प्रशासक को शहर की इस अहम पहचान को ठीक कराना चाहिए।
- महेश शर्मा, स्थानीय नागरिक।
घंटाघर की मरम्मत के लिए कई बार निकाय प्रशासन से लिखित रूप से की मांग की जा चुकी है। शहर की मुख्य पहचान के प्रति निकाय का रवैया लापरवाही भरा है। शीघ्र ही इसकी मरम्मत होनी चाहिए।
- राजेंद्र रक्खा, स्थानीय नागरिक।
अधिकारी की सुनिए
घंटाघर का मामला संज्ञान में है। जल्द ही इसकी मरम्मत कराई जाएगी और घड़ी को भी ठीक कराया जाएगा। निगम शहर की धरोहर के रूप में स्थापित स्थलों के रखरखाव के प्रति पूरी तरह से गंभीर है।
महेंद्र कुमार यादव, सहायक नगर आयुक्त