अखाड़ा परिषद देशभर में खोज खोज कर फर्जी संतों की सूची तो जारी कर रही है, लेकिन खुद अखाड़ों में छिपे फर्जी बाबाओं का नाम लेने से बच रही। अखाड़ा परिषद ने अभी तक दो चरणों में सत्रह संतों को फर्जी घोषित किया है। इनमें से कोई भी अखाड़े से जुड़ा हुआ नहीं है। जो फर्जी बताए गए हैं, वे अखाड़ा परिषद के आदेशों को हंसी में उड़ा रहे हैं। अखाड़ा परिषद ने आज तक एक भी आचार्य, मंडलेश्वर, श्रीमहंत और महंत को फर्जी घोषित नहीं किया। जबकि हकीकत ये है कि दर्जनों बाबाओं पर थानों में मुकदमे दर्ज हैं और न्यायालयों में पेशियां चल रही हैं।
अखाड़ा परिषद ने जिस त्रिकाल भंवता को हाल ही में फर्जी घोषित किया, वे संत का दर्जा आज तक नहीं प्राप्त कर सकी। त्रिकाल भंवता वास्तव में महिला संतों का परी अखाड़ा बनाना चाहती थी, लेकिन किसी भी संन्यासी अखाड़े ने उन्हें मान्यता नहीं दी। जबकि उन्होंने बाकायदा संन्यास की दीक्षा खुद प्रयाग में ली है। संतों का समर्थन हासिल करने के लिए वे हरिद्वार के अखाड़ों में भी भटकती रही। परि अखाड़े के रूप में 14 वां अखाड़ा बनाते हुए जब उन्होंने उज्जैन और नासिक में कुंभ स्नान करना चाहा तब उन्हें खदेड़ दिया गया। वे कुंभ स्नान भी नहीं कर पाई। बाद में त्रिकाल भंवता बहुचर्चित रियलिटी शो बिग बॉस में चली गई और कुछ दिनों बाद बाहर आ गई। अब उनको फर्जी घोषित किए जाने पर महिला संतों का दंडीबाड़ा नाराज है। बाड़े की महिला संतों का कहना है कि जब अखाड़ा परिषद उन्हें अपने बीच का मानती ही नहीं तो बाहर किए जाने का अर्थ क्या है। अखाड़ों से जुड़े ऐसे अनेक संत हैं जो बहुचर्चित रहे हैं। कुछ संतों पर तो तीन से चार दर्जन मुकदमे देश के विभिन्न न्यायालयों में चल रहे हैं। हरिद्वार के ही कुछ बाबाओं पर दिल्ली और प्रयाग के थानों में दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं। इन मुकदमों में हत्या के प्रयास के मामले भी हैं।
अखाड़ा परिषद ने जिन आसाराम, रामपाल, राम रहीम, सच्चिदानंद, वीरेंद्र दीक्षित, राधे मां आदि को फर्जी करार दिया, उनमें से कोई भी किसी भी अखाड़े से जुड़ा नहीं है। किसी ने भी संन्यास या वैराग्य दीक्षा ग्रहण नहीं की है। ये व्यक्ति भगवा भी धारण नहीं करते। जबकि जिन्हें अब तक फर्जी घोषित नहीं किया गया, वे पूर्ण भगवाधारी हैं और अखाड़ों और मठों में रह रहे हैं। हालात यहां तक बदतर है कि उच्च पदों आसीन हुए संत भी पूर्ण दीक्षित नहीं हैं। इसके विपरीत ईसाई धर्म में किसी को संत घोषित करने की प्रक्रिया दशकों तक चलती है। मदर टेरेसा जैसे को तो मरणोपरांत संत की उपाधि दी गई। जबकि देश के हालिया संत जगत में प्रवेश के साथ ही संत का दर्जा मिल जाता है। अखाड़ा परिषद द्वारा जिन्हें फर्जी बताया गया है, देश में प्रचलित संत परंपरा में उनमें से कोई भी न तो अखाड़ों से जुड़ा है और न ही षडदर्शन अथवा साधु समाज परंपरा से, ऐसे में परिषद का उन्हें फर्जी घोषित करना ही हास्यास्पद हो चला है।