श्रीनगर। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना झील का असर उन गांवों मेें दिखने लगा है, जहां पहले सुबह होते ही खुली धूप खिलती थी। इन गांवों में अब शीतकाल में 12 बजे बाद ही धूप के दर्शन हो रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि झील बनने के बाद उनके गांवों की स्थिति घाटी जैसी हो गई है। इससे उनकी फसल पर भी असर पड़ रहा है।
श्रीनगर, श्रीकोट, उफल्डा, कीर्तिनगर और स्वीत जैसे क्षेत्रों में शीतकाल में पहले से ही कोहरा लगता आया है, जबकि इन क्षेत्रों के ऊपर पहाड़ी में बसे गांवों में सुबह होते ही धूप निकल आती थी। लेकिन अब यहां ऐसा नहीं हो रहा है। ग्रामीण श्रीनगर जल विद्युत परियोजना को इसकी वजह बताते हैं। भटोली-मंदोली निवासी शरमा देवी, हेमा बिष्ट, सुनीता, बीना और नीलम ने बताया कि पिछले दो-तीन सालों से कोहरा लगने लगा है। कई बार दोपहर बाद ही धूप दिखती है। कोहरे की वजह से उनकी दिनचर्या प्रभावित हो गई है। इसके अलावा फसलों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है। पर्याप्त धूप न मिलने से पौधे गल रहे हैं।
उत्पादकता पर पड़ता है असर
पानी का वाष्पीकरण होता रहता है। ठंडी वाष्प जब डस्ट पार्टीकल्स से मिलती है, तो कोहरा लगता है। झील बनने अलकनंदा में वाटर बॉडी (जलाशय) बड़ी हो गई है। इससे ज्यादा वाष्पीकरण हो रहा है, जो इन गांवों तक पहुंच रहा है। इससे धूप धरती तक नहीं पहुंच पाती है। हालांकि पहाड़ में टॉक्सिक पार्टीकल्स (जहरीले कण) नहीं होते हैं, लेकिन विटामिन डी नहीं मिल पाती है। फोटो पीरियड (धूप का समय) कम होने से प्रकाश संश्लेषण कम होता है इसका सीधा असर वनस्पतियों के बीजांकुर और वृद्धि पर पड़ता है। पेड़-पौधों की उत्पादकता कम जाती है ।
-प्रो. आरसी शर्मा, एचओडी पर्यावरण विज्ञान केंद्रीय गढ़वाल विवि श्रीनगर।