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समाज को जाति, धर्म में बांटना देशहित में नहीं
-- तीर्थनगरी पहुंचे आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर
-- सत्संग सभा में अनुयायियों औरा साधकों को दिए प्रवचन
अमर उजाला ब्यूरो
मुनिकीरेती। आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख श्रीश्री रविशंकर का कहना है कि देश में धर्म, जाति के नाम पर बंटता समाज चिंता का विषय है, यह देशहित में ठीक नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदू समाज के पवित्र व सर्वमान्य ग्रंथ के रचियता वाल्मीकि समाज के महर्षि वाल्मीकि थे, जिन्हें भगवान का दर्जा प्राप्त है। शुक्रवार को आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर तीर्थनगरी पहुंचे। इस अवसर पर मुनिकीरेती के दयानंदनगर शीशमझाड़ी स्थित वेद विधान महाविद्यालय पीठ में श्रीश्री रविशंकर के सानिध्य में सत्संग सभा का आयोजन किया गया, जिसमें 15 देशों के श्रद्धालु प्रतिभाग कर रहे हैं।
इस मौके पर साधकों और अनुयायियों को संबोधित करते हुए श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि त्याग, तपस्या व भक्ति ही ईश्वर को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। उन्होंने कहा कि परब्रह्म का कोई रूप नहीं होने पर भी वह अनेक रूपों में विराजमान हैं। हर इंसान के अंदर भगवान विराजमान हैं, चाहे वह चोर हो, डकैत हो या अन्य किसी भी अनैतिक कार्यों को करने वाला हो। उन्होंने बताया कि मन की शांति से ही चेतना जागृत होती है, इसलिए एकाग्र मन से प्रभु का स्मरण करने से ही मन को शांति मिलती है, जिससे इंसान के अंदर की चेतना जागृत होती है।
देश और दुनिया में अधिकांश युवा आध्यात्म की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आज समाज धर्म, जाति व संप्रदाय के नाम पर बंटता जा रहा है। जोकि कतई देश व समाज के हित में ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि इंसान सिर्फ परमपिता परब्रह्म की संतान है, इसमें न कोई ऊंच है और न ही कोई नीच है। यह भेदभाव हमारे मन ने पैदा किया है भगवान ने नहीं। इस अवसर पर स्वामी स्वतंत्रतानंद, दिव्यानंद सरस्वती, स्वामी प्रबुद्धानंद, स्वामी विश्वचेतनानंद, एचआईएचटी के कुलपति विजय धस्माना आदि मौजूद थे।