श्रीनगर। मंजूघोष मेले के पहले दिन (छोटा कांडा) 27 निशाण (देव प्रतीक) चढ़ाए गए। मेले बड़ी संख्या में आसपास के क्षेत्र के ग्रामीण पहुंचे थे। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
श्रीनगर से करीब 13 किमी दूर कांडा में हर साल दीपावली के दूसरे दिन दो दिवसीय (बड़ा व छोटा कांडा) मंजूघोष मेला लगता है। कांडा गांव में मंजूघोष, महाकाली व मंजूदेवी मंदिर स्थित हैं। मेले में दूर दराज से श्रद्धालु निशाण लेकर पहुंचते हैं। मंजूघोष मेला कांडा मेला नाम से प्रसिद्ध है। पहले यहां पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन एक दशक पहले यह प्रथा बंद हो गई। अब यहां केवल निशाण चढ़ते हैं।
पहले दिन के मेले को छोटा कांडा व दूसरे दिन के मेले को बड़ा कांडा कहा जाता है। शुक्रवार छोटा कांडा के दिन विभिन्न गांवों के ग्रामीणों ने 27 निशाण (देव प्रतीक) चढ़ाए गए। मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारिका प्रसाद भट्ट ने कहा कि सबसे पहले कांडा के ग्रामीणों का निशाण मंदिर में पहुंचा, जबकि सबसे अंत में बडोला के ग्रामीणों ने निशाण चढ़ाया। भट्ट ने बताया कि बड़ा कांडा के दौरान भी ग्रामीणों की ओर से निशाण चढ़ाए जाएंगे। मेले में शांति व्यवस्था के लिए कोतवाल एनएस बिष्ट पूरे दिन मेले स्थल पर मय फोर्स तैनात रहे।
यह है मान्यता
मंजूघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर स्थित है। शिव पुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने घोर तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। भगवान शंकर ने क्रोधित होकर कामदेव को भष्म कर दिया। तबसे इस पर्वत को कामदाह पर्वत कहा जाता है। जो कालांतर में कांडा हो गया।
वहीं एक और अन्य कथा प्रचलित है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी। मंजू पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ, तो उसने भैंसे का रूप धरकर ग्रामीणों पर हमला कर दिया। मंजूदेवी को यह सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रूप धारण कर कोलासुर का वध कर दिया। तब से कांडा मेला मनाया जाता है।