देवाल। पहाड़ के गांवों में शादी विवाह समारोह में गाए जाने वाले सौगान बोला भूमि को भूमियाला, सौगान बोला पितृृ देवता, सौगान बोला खोली का गणेशा, सौगान बोला पंचनामा देवता... जैसे मांगल गीत अब कम ही सुनने को मिलते हैं। ऐसे में इन पारंपरिक मांगल गीतों के संरक्षण और नई पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक करने के लिए पद्मश्री जागर गायिका बसंती बिष्ट आगे आई हैं। बसंती बिष्ट विवाह और अन्य समारोह में शामिल होकर महिला मंगल दलों को इन मांगल गीतों की विधा सिखा रही हैं। यही नहीं इन गीतों के संरक्षण के लिए महिलाओं को शपथ दिलाकर अपील भी कर रही हैं।
पद्मश्री, तीलू रौतेली, रानी आहिल्या बाई सहित एक दर्जन से अधिक पुरस्कार से सम्मानित राज्य की प्रमुख जागर गायिका बसंती बिष्ट शादी विवाह के माध्यम से मांगल गीतों का प्रचार कर क्षेत्र की महिलाओं को इसमें दक्ष कर रही हैं। ब्लाक देवाल की ल्वाड़ी गांव की रहने वाली बसंती बिष्ट क्षेत्र में हो रहे विवाह समारोह में शामिल होकर मांगल गीतों के गायन की विधा बता रही हैं। वह वाण, बांक, मुंदोली, कुलिंग, ल्वाड़ी, हरनी सहित एक दर्जन गांव में जागर के साथ ही ढोल, डौर, दमाऊं, हुड़का आदि पारंपरिक यंत्रों के संरक्षण और प्रचार करने की अपील भी कर रही हैं। अमर उजाला से बातचीत में बसंती बिष्ट ने बताया कि यहां पाश्चात्य संस्कृति तेजी से पांव पसार रही है। ऐसे में युवा पीढ़ी के सामने पारंपरिक संस्कृति को बचाने की चुनौती है। इसके लिए सभी लोक कलाकारों को प्रयास करने होंगे। बसंती बिष्ट के साथ यहां पहुंचे लोक संस्कृति संरक्षण के क्षेत्र में शोध कर रहे डा. कृपाल भंडारी ने बताया कि यहां की लोक परंपरा को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है।