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पात्रों के अभाव में अब नही होती नगर में रामलीला

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पात्रों के अभाव से रामलीला आयोजन पर लगा विराम
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-- जहां रामलीला होती थी वहां अब हो चुके हैं निर्माण

अमर उजाला ब्यूरो
डोईवाला।
भगवान राम की लीला नई पीढ़ी तक पहुंचाने की वाहक माने जाने वाली रामलीला डोईवाला नगर में एक दशक पहले पात्रों के अभाव के कारण बंद हो गई। इंटरनेट के युग में अब युवा पीढ़ी रामलीला जैसे पखवाडे़ भर चलने वाले धार्मिक आयोजन में दिलचस्पी नहीं रखती है। नगर में होने वाले श्री रामलीला महोत्सव के जिस आयोजन का शहर के लोग साल भर बेसब्री से इंतजार करते थे। वह अब पात्रों के अभाव में नहीं हो पाती है। पात्रों की समस्या के साथ लोगों की घटती दिचलस्पी भी इसको मुख्य कारण बन गया है। सन 1972 से शुरू हुई रामलीला का कुछ समय तक क्रेज बना रहा। नगर की रामलीला को देखने के लिए डोईवाला के दूरस्थ क्षेत्रों से लोग बैलगाड़ियों और अन्य साधनों से पहुंचते थे।
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रामलीला में अड़चनें स्थान अभाव के कारण आनी शुरू हुई हैं। रामलीला का आयोजन कभी ब्लॉक मुख्यालय परिसर में तो कभी शुगर मिल में हुआ। जिन स्थानों पर श्रीरामलीला महोत्सव होते थे वहां निर्माण कार्य हो गए। पूर्व वन अधिकारी रहे हरीशचंद वर्मा के प्रयासों से साल 2005 तक रामलीला के चाहने वालों ने नगर में आयोजन कराया। लेकिन इसके बाद पात्रों का अभाव, बढ़ती महंगाई, पात्रों के वस्त्रों की कमी समेत तमाम परेशानियां खड़ी होने लगी। नतीजा, नगर की चर्चित श्रीरामलीला महोत्सव पर विराम लग गया। श्री रामलीला कमेटी डोईवाला के डॉयरेक्टर रहे सत्यप्रकाश गुप्ता ने बताया कि पुराने लोग रामलीला को पंसद करते हैं, जबकि नई पीढ़ी मोबाइल में गुम होकर रह गई है। रामलीला भारतीय संस्कृति को समीप से जानने का सशक्त माध्यम है। सरकार ने जरूर कुछ पुरानी रामलीलाओं को प्रोत्साहित कर उचित कदम उठाया है।
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