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श्रद्धालुओं की शक्ति का केंद्र अनोखा त्रिभुज

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
नवरात्र में श्रद्धालुओं की आस्था का असली केंद्र वह अनोखा त्रिभुज है, जिसकी शक्ति जमीन में विद्यमान है। इस त्रिभुज को पूजने के लिए अधिकांश श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। सभी पौराणिक मंदिरों में चल रहे अनुष्ठानों में मां के भक्त एक न एक दिन जरूर भाग लेते हैं।
शिवालिक पहाड़ियों में स्थित मनसा और चंडी देवी ऊपरी शक्तियां हैं। इन दोनों शक्तियों का मिलन तलहटी में बनी माया देवी मंदिर से होता है। इस प्रकार शक्ति का एक ऐसा त्रिभुज धर्मनगरी में बनता है, जिसका केंद्र धरती के भीतर स्थित है। केंद्र में हरिद्वार की अधिष्ठात्री वह माया देवी है, जहंा सती के दहन के बाद उनकी पार्थिव देह रखी गई थी। ये तीनों स्थल नवरात्र में श्रद्धालुओं के आगमन का केंद्र बने हैं। चौथा केंद्र शिवालिक वनमाला स्थित मां सुरेश्वरी देवी है, जहां पौराणिक काल से भगवती की आराधना हो रही है। इन चारों मंदिरों को मिलाकर हरिद्वार के चतुष्कोण भी बनते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि कनखल की शीतला माता को शामिल कर लें तो वास्तव में शक्तियों का पंचकोण भी बन जाता है। अलबत्ता इन सभी शक्तियों का केंद्र धरती में है। वह स्थल माया देवी का अति प्राचीन प्रांगण ही माना गया है। शुक्रवार को ब्रह्मचारिणी के स्वरूप के पूजा के लिए भक्तों का तांता लगा रहा। यद्यपि इन नौ स्वरूपों के मंदिर कहीं भी मौजूद नहीं हैं। पर उनका वजूद दिनों के हिसाब से देवी दुर्गा में ही माना गया है। पूजन मां दुर्गा का होता है और दिन की देवी के नामों का उच्चारण किया जाता है।
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पंचपुरी में हजारों घरों में नवरात्र में भगवती के साधारण और संपुट पाठ होते हैं। मंदिरों और सार्वजनिक आश्रमों में जहां विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान, शतचंडी आदि चलते हैं, वहीं पंचपुरी के घरों में देवी भागवत स्वरूप को मुख्य मानते हुए प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ चल रहा है। इन पाठों का प्रभाव पंचपुरी के आकाश पर पड़ता है और आने वाले सभी श्रद्धालुओं पर भक्ति रस की वर्षा होती है। इन दिनों माता की चौकियां तथा अल्पकालिक जागरणों का आयोजन शुरू हो गया है। सैकड़ों लोग प्रतिदिन मां शीतला के मंदिरों में प्रसाद चढ़ाने पहुंच रहे हैं। यह क्रम पूरे नवरात्र चलता रहेगा।
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