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हरकी पैड़ी पर कभी नहीं रहा कोई गुरुद्वारा: गंगा सभा

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
हरकी पैड़ी की प्रबंध कार्यकारिणी संस्था गंगा सभा का कहना है कि हरकी पैड़ी क्षेत्र में कभी कोई गुरुद्वारा नहीं रहा। हरिद्वार के गऊ घाट पर एक गुरुद्वारा है जहां आज भी लंगर बांटा जाता है। हरकी पैड़ी से सटे नाई सोता पर ध्वस्त हो चुके लंढौरा हाउस में एक पंडित ने ग्रंथ साहब रख लिए थे। अलबत्ता यह काम कमाई के लिए किया गया था, यहां कभी ग्रंथ साहब का प्रकाश नहीं हुआ।
गंगा सभा के महामंत्री रामकुमार मिश्रा ने बताया कि हरकी पैड़ी और ब्रह्मकुंड पर प्राचीनकाल से हिंदू समाज और सिख गंगा स्नान तथा अस्थि प्रवाह के लिए आते रहे हैं। समीपवर्ती लंढौरा हाउस में कुछ दुकाने थी, जिनमें से एक में मथुरा से हरिद्वार आकर घाट का काम करने वाले पं.विष्णु शर्मा ने ग्रंथ साहब रख लिए थे। हरकी पैड़ी पर आने वाले सिख इस स्थान पर अस्थि प्रवाह के बाद आते और मत्था टेककर कुछ भेंट चढ़ा देते। इस स्थान पर ज्ञान गोदड़ी के नाम से कोई गुरुद्वारा कभी नहीं बनाया गया। गंगा सभा सिख समाज का दिल से अभिनंदन करती है। हरिद्वार में कहीं ज्ञानगोदड़ी गुरुद्वारा बनाया जाता है तो उसका स्वागत किया जाएगा। उधर तीर्थ पुरोहित समाज के बुजुर्ग पुुरोहितों ने किसी प्रकार के गुरुद्वारे से इन्कार किया है। कुशावर्त निवासी तीर्थ पुरोहित शिवकुमार कौशिक के अनुसार पं. विष्णु शर्मा के निधन के बाद लंढौरा हाउस धर्मशाला में रहने वाली माई रामप्यारी कमाई के लिए उस दुकान में रहने लगी। बाद में उसकी हत्या हो गई और कुछ दिनों बाद यह बिल्डिंग कुंभ मेला विस्तार के लिए वर्ष 1973 में तोड़ दी गई। लंढौरा हाउस में जितनी भी दुकानें थी, उन्हें बाद में प्रशासन ने पालिका भवन में स्थान दिया। ग्रंथ साहब वाली दुकान का मुआवजा मांगने वाला कोई नहीं था। पं. किशोर नंद सैरेया के अनुसार हरकी पैड़ी पर अनादि काल से गंगा सभा और पुरोहितों के अधिकार में रहा है। यहां का माहौल कदापि खराब नहीं करना चाहिए। हिंदू और सिख सौहार्द पूर्वक रहते आए हैं। प्रेमनगर पुल के पास जब गुरुद्वारा बनेगा तो पुरोहित समाज खुद कारसेवा के लिए आगे आएगा। बड़ा बाजार निवासी पं. मोहन लाल कहते हैं कि हरकी पैड़ी पर कोई गुरुद्वारा कभी नहीं रहा। इस बारे में हरिद्वार के सिख भली भांति जानते हैं। इसलिए उन्होंने प्रेमनगर पुल के पास भूमि लेना स्वीकार कर लिया है। कुछ बाहरी तत्व हरिद्वार का माहौल बिगाड़ना चाहते हैं। इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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गौरतलब है कि 1974 के कुंभ मेले के लिए अनेक भवन ढहाए गए थे। इन भवनों में हजारों लोग निवास करते थे। सबको तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजे दिए ाो। अनेक को हरकी पैड़ी पर बने पालिका बाजार में दुकानें आवंटित की गई। जहां तक गुरुद्वारा होने की बात है यह बात पिछले कुछ वर्षोँ से पहली बार सामने आ रही है।
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