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अपनी माता को दिए वचन को निभाते आ रहे बदरीनाथ

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बदरीनाथ। क्षेत्र में माता मूर्ति का नारायण पर्वत की तलहटी पर मंदिर है। मान्यता है कि आदिकाल में भगवान बदरीनाथ जब बदरीकाश्रम क्षेत्र में तपस्यारत थे तो अपने बेटे को मिलने के लिए माता मूर्ति और पिता धर्म (भीम पुल से आगे सतोपंथ क्षेत्र को धर्म क्षेत्र माना जाता है।) भी बदरीनाथ धाम पहुंचे। तब भगवान बदरीनाथ ने अपनी माता मूर्ति को प्रतिवर्ष बामन द्वादशी पर उन्हें मिलने के लिए आने का वचन दिया था। आज भी बदरीनाथ अपनी माता को दिए वचन को निभाते आ रहे हैं। बदरीनाथ धाम में भगवान बदरीनाथ काले पत्थर की शिला पर पदमासन में तपस्यारत हैं। लिहाजा, माता मूर्ति से मिलने के लिए बदरीनाथ के प्रतिनिधि के रूप में उद्धव जी उत्सव डोली में बैठकर माता मूर्ति से मिलने जाते हैं। दिनभर माता मूर्ति मंदिर में बदरीनाथ और माता मूर्ति की पूजा-अर्चना होती है।
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बदरीनाथ धाम में देव मिलन की इस अनूठी धार्मिक परंपरा के तीर्थयात्री भी मुरीद हो गए। दिल्ली के दीपक मर्तोलिया और जन्मेजय का कहना है कि भगवान बदरीनाथ के अपनी माता से मिलने की अनूठी परंपरा को करीब से देखा। चेन्नई के तीर्थयात्री प्रेम कुमार, अर्चना और सिद्धार्थ का कहना है कि भगवान बदरीनाथ की माता और पिता के बारे में जानने का मौका मिला। इस यात्रा को कभी नहीं भूलेंगे। माता मूर्ति का मंदिर देश के अंतिम गांव माणा में है। माणा के ग्रामीणों को इस मेले का बेसब्री से इंतजार रहता है। जब उद्धवजी की उत्सव डोली माता मूर्ति मंदिर के लिए प्रस्थान करती है तो माणा गांव की महिलाएं हाथ में हरियाली लेकर मंदिर में पहुंचती हैं। महिलाएं भगवान को हरियाली अर्पित करने के साथ ही अपनी पारंपरिक वेशभूषा में मांगल गीत गाती हैं। माता मूर्ति मंदिर परिसर में मौजूद सैकड़ों तीर्थयात्रियों के लिए ये पल कभी न भूलने वाले होते हैं।
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