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ताकि महिलाओं और जंगलों पर बोझ हो कम

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संदीप थपलियाल
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श्रीनगर। महिलाओं पर काम का बोझ कम करने, चारापत्ती व जलावनी लकड़ी के लिए जंगलों के ऊपर निर्भरता कम करने, पलायन रोकने और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए जीबी पंत पर्यावरण राष्ट्रीय संस्थान के युवा वैज्ञानिक ने एग्रो-फोरेस्ट्री (कृषि-वानिकी/ खेत-खलिहान) नीति बनाने का सुझाव दिया है। वर्तमान में हिमालयी क्षेत्र के लिए कृषि-वानिकी नीति नहीं है। अगर नीति बनती है तो ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता कम हो सकेगी।
जीबी पंत पर्यावरण राष्ट्रीय संस्थान और युवा वैज्ञानिक डा. प्रकाश फोंदणी के इस सुझाव को अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इनर्जी पॉलिसी ने भी शोध पत्र प्रकाशित करते हुए सराहा है। डा. फोंदणी ने दो साल तक टिहरी जिले के 20 गांवों (समुद्र तल से 800-2000 मीटर ऊंचाई तक) में समुदाय आधारित एग्रो-फोरेस्ट्री मॉडल का अध्ययन किया। पूर्व में जंगल और कृषि-वानिकी से चारा-पत्ती के संग्रहण पर शोध हुए हैं, लेकिन डा. फोंदणी ने संग्रहण के साथ ही खपत को अध्ययन का मुख्य बिंदु बनाया। ताकि बायोमॉस का तुलनात्मक अध्ययन हो सके। शोध में यह सामने आया कि एग्रो-फोरेस्ट्री (खेत-खलिहान) से सिर्फ 30 फीसदी बॉयोमास मिल रहा है। शेष 70 फीसदी जंगलों से पूर्ति हो रही है। प्रतिवर्ष/प्रति व्यक्ति 242.95 से 373.16 किलोग्राम जलावनी लकड़ी प्रयोग करता है। जबकि प्रतिवर्ष/प्रति पशु 154.34 से 463.14 किग्रा चारापत्ती की खपत होती है। खपत का आंकड़ा मिलने के बाद घरेलू ऊर्जा का आकलन किया गया। डा. फोंदणी बताते हैं कि अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला कि स्थानीय लोग जलावनी लकड़ी, टिंबर, फाइबर, भोजन और औषधीय वनस्पतियों के लिए कृषि-वानिकी पर 30 प्रतिशत निर्भर हैं। वहीं 70 फीसदी घरेलू ऊर्जा की पूर्ति बायोमास (जैव-ईंधन) से हो रही है। इस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है कि ऊर्जा के क्षेत्र में कृषि-वानिकी का कितना योगदान है। उन्होंने बताया कि कृषि-वानिकी में 31 प्रजातियों के पौधों का चयन किया गया, जिन्हें लोग खेत-खलिहानों में उगाते हैं। ताकि आसानी से चारा-पत्ती और जलावनी लकड़ी उपलब्ध हो सके। वर्तमान में चारा-पत्ती और जलावनी लकड़ी के लिए जंगलों के ऊपर बहुत दबाव है। अगर जैव-ऊर्जा के लिए ठोस नीति और कानून बनते हैं, तो जंगलों के साथ-साथ मानव समुदाय सुरक्षित रहेगा।
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पहाड़ में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं पर खेती और पशुपालन का बहुत दबाव है। महिलाएं जंगलों में दुर्घटनाओं का शिकार हो जाती हैं। आए दिन गुलदार और भालू के हमलों महिलाओं के मारे जाने या घायल होने की खबरें आती रहती हैं। घास काटते वक्त पहाड़ी या पेड़ से फिसलकर कई महिलाएं जान गंवा चुकी हैं। अगर कृषि-वानिकी नीति पर काम होता है, तो महिलाओं को इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ेगा।
डा. आरके मैखुरी, वैज्ञानिक प्रभारी जीबी पंत पर्यावरण संस्थान श्रीनगर
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