लक्ष्मी प्रसाद कुमेड़ी
कर्णप्रयाग। धार्मिक आस्था का प्रतीक माने जाने वाले वैदनी में आज (सोमवार) श्रद्घालुओं का जमावड़ा लगेगा। 16 अगस्त को घाट के कुरूड़ से चली नंदा की डोली सोमवार को यहां पहुंचकर वैदनी कुंड में स्नान करेगी। कई श्रद्घालु अपने पूर्वजों को यहां तर्पण भी देंगे। यहां सप्तमी को पूर्वजों को तर्पण देने की परंपरा है, वहीं सुदंरता से भरपूर वैदनी बुग्याल में इस अवसर पर भारी संख्या में पर्यटकों के भी जुटने की उम्मीद है।
समुद्रतल से करीब 11004 फीट की ऊंचाई पर बुग्यालों के बीच स्थित है वैदनी कुंड। त्रिसूली और नंदा घुंघटी पर्वतों के दर्शन भी यहां से होते हैं। हर वर्ष होने वाली नंदा लोक जात यात्रा के तहत हिमालय पुत्री मां नंदा अपने ससुराल कैलास जाने से पहले यहां पहुंचती है। मां नंदा को कैलास विदा करने के लिए हर वर्ष नंदा लोक जात और 12 वर्ष में श्रीनंदा देवी राजजात का आयोजन किया जाता है। श्रीनंदा राजजात में जहां होमकुंड में पूजा अर्चना कर श्रद्धालु घाट होते हुए नौटी वापस पहुंचते हैं, वहीं लोक जात में वैदनी में पूजा अर्चना के बाद देवी की डोली अपने ननिहाल देवराड़ा पहुंचती है और वहां छह माह प्रवास के बाद वापस कुरूड़ जाती है। सोमवार को मां नंदा की डोली वैदनी पहुंचेगी, यहां पूजा अर्चना और कुंड में स्नान संपन्न होगा। स्थानीय निवासी डीडी कुनियाल बताते हैं कि दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु हो जाने पर कई लोग यहां पहुंचकर ऐसे पूर्वजों को तर्पण आदि की प्रक्रिया इस दिन संपन्न करते हैं। यही नहीं मान्यता यह भी है कि यहां भगवान व्यास जी के निर्देशन में गणेेश ने वेदों की रचना की, जिसकी शिला आज भी वैदनी में मौजूद है।
भूस्खलन बन रहा खतरा
कर्णप्रयाग। वैदनी कुंड धार्मिक दृष्टि के अलावा पर्यटन दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। करीब 10 किमी में फैले इस बुग्याल और करीब डेढ़ सौ मीटर चौड़े और दो सौ मीटर लंबे क्षेत्र में फैले कुंड को देखने के लिए यहां वर्षभर पर्यटक पहुंचते हैं, लेकिन उपेक्षा के चलते यहां कुंड सिमटने लगा है। देवाल की प्रमुख उर्मिला बिष्ट का कहना है कि कुंड में लगातार भूस्खलन का मलबा जमा हो रहा है, जिससे कुुंड सिकुुड़ रहा है।