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उतराखंड की रग रग में बस है ढ़ोल और दमाऊं

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
पर्वतीय अंचल की लोक संस्कृति के प्रतीक ढोल, दमाऊं व हुड़के की थाप उत्तराखंड के लोगों के रग- रग में बसी हुई है। सरकार की अनदेखी के बावजूद कई बाजीगिरी ढोल और दमाऊं से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उत्तराखंड के पर्व, मेलों व संस्कारों में ढोल-दमाऊं का विशेष स्थान है। यहां प्रेमनगर आश्रम में चल रही नमो दान कार्यशाला ढोल-दमाऊं को नई पहचान दिलाने में कामयाब होगी, ऐसी संभावनाएं जताई जा रही है।
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ढोल को राज्य के प्रमुख लोक वाद्य यंत्रों की श्रेणी में रखा गया है। इसकी थाप पर जागर के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। शुभ कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। ढोल दमाऊं के अलावा हुड़के का प्रयोग जागर, झोड़ा, छपेली, चांचरी, बौल-रमौल, बैर-भगनौल में किया जाता है। हुड़के से निकलने वाली 22 तालों की गूंज लोक संगीत का दर्शन कराती है लेकिन आधुनिक दौर में इस वाद्य यंत्र को बजाने वाले लोक कलाकार कम ही रह गए हैं। ग्राम टिहरी जिले के अलेरू गांव के बचनदास और उनके दो पुत्र राजकुमार और भगवानंद की मानें तो ढोल और दमाऊं उनकी रग-रग में बसा है। वह अपने पांच वर्षीय पोते मोहित को भी ढोल के गुर सीखा रहे हैं। परिवार की मानें तो उनके गांव के कई लोग शहरी क्षेत्रों में जरूर बस गए हैं, लेकिन साल में एक बार वह अपने गांव आकर पैतृक घर में पूजा पाठ कर ढोल दमाऊं अवश्य सुनते हैं। अल्मोड़ा जिले के दौलाघट से पहुंचे चंद्रभान बताते है कि गांव में आज भी नगाड़ों की धुन बजती है। कई मेलों में गांव के कलाकारों को बुलाया जाता है। जहां क्षेत्र के लोगों के अलावा बाहर से लोग भी पहुंचते है और अपनी संस्कृति को देेखते है। अल्मोड़ा के कुछ गांव में परिवार कम हुए है, लेकिन साल दो साल में एक बार पर्वतीय लोग अपने घर वापस आकर धुन का आनंद जरूर लेते है।
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