अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
नगर निगम स्वच्छता अभियान पूरी तरह से फिसड्डी साबित हो रहा है। पांच साल बाद भी शहर के 30 वार्डों में डोर-टू-डोर (घर-घर) कूड़ा लेने का काम शुरू नहीं हो सका है। जबकि नगर निगम डोर-टू-डोर कूड़ा उठाने की व्यवस्था पर दस करोड़ खर्च कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं है।
नगर निगम ने जेएनएनयूआरएम की 16 करोड़ रुपये से अधिक स्वीकृत बजट वाली सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट परियोजना के लिए पीपीपी मोड के तहत कोलकात्ता की केआरएल के साथ 30 अक्तूबर 2012 को अनुबंध साइन किया था। अनुबंध के अनुसार केआरएल को सबसे पहले कंपोस्टिंग प्लांट स्थापित करना था और फिर डोर-टू-डोर कूड़ा लेने का काम करना था। नगर निगम ने बाद में शुरू होने वाले काम पहले शुरू कराकर कूड़ा निस्तारण की समस्या को बढ़ाने का काम किया है। केआरएल का कंपोस्टिंग प्लांट तैयार है। नगर निगम के 30 में से 23 वार्डों से केआरएल घर-घर जाकर कूड़ा लेने का दावा कर रहा है। बावजूद इसके कूड़ा निस्तारण को लेकर पार्षदों की शिकायतें बनी हुई है। कूड़ा उठाने का शुल्क (टिपिंग फीस) समय पर नहीं मिलने को लेकर कंपनी की शिकायत भी बढ़ती जा रही है। सोमवार को जिलाधिकारी की समीक्षा बैठक में भी स्वच्छ भारत मिशन का मुद्दा उठा था और अपेक्षित प्रगति नहीं दिखाई देने पर डीएम को फोन कर नगर आयुक्त को तलब करना पड़ा था।
नहीं हो पाया कंपोस्ट प्लांट का उद्घाटन
काम छोड़कर जाने के एक सप्ताह बाद मेयर मनोज गर्ग के निमंत्रण पर जब केआरएल दोबारा लौटी तो नगर निगम और केआरएल के शीर्ष कर्ताधर्त्ताओं के साथ हुए समझौते कु मुताबिक कंपनी को चार जुलाई को कंपोस्ट प्लांट का उद्घाटन करा देना था और सभी 30 वार्डों में घर-घर से कूड़ा लेने का काम कर देना था। इसके साथ ही नगर निगम को टिपिंग फीस रिवाइज कराने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजना था। लेकिन इनमें से कोई भी काम नहीं हुआ। शासन ने कंपनी की टिपिंग फीस बढ़ाने से मना कर दिया। कंपनी के कंपोस्ट को अब तक उत्तराखंड प्रदूूषण नियंत्रण बोर्ड से हरी झंडी नहीं मिली है। कंपनी के प्रबंधक मनोज शर्मा का कहना है कि 15 जुलाई को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी के लिए 85 हजार रुपये की फीस जमा करा दी गई है। एनओसी मिलते ही प्लांट में कूड़े से खाद बनाने का काम शुरू हो जाएगा।
भ्रष्टाचार भी है नाकामी का कारण
स्वच्छ भारत मिशन को परवान चढ़ाने में नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार भी नाकामी का एक कारण है। निगम के कुछ अधिकारी, निर्वाचित प्रतिनिधि तथा कर्मचारी नहीं चाहते की पूरी व्यवस्था को केआरएल के हवाले कर दी जाए। इसमें सबसे बड़ा खेल कूड़ा गाड़ियों के नाम पर होने वाले तेल की चोरी शामिल है। 23 वार्डों में केआरएल के काम करने व कूड़ा उठाने के बाद भी नगर निगम का तेल खर्च कम नहीं हो रहा है। उसकी 30 से अधिक कूड़ा गाड़ियां लाखों को तेल पी रही हैं। खुद मेयर मनोज गर्ग कई बार इस पर लगाम लगाने को कह चुके हैं। नगर आयुक्त जांच कमेटी गठित कर चुके हैं, परंतु नतीजा शून्य ही है। केआरएल मात्र 100 कर्मचारियों से 23 वार्डों से घर-घर से कूड़ा उठा रहे है। जबकि निगम के 600 सफाई कर्मचारी सात वार्डों को भी साफ नहीं रख पा रहे हैं। नालों की सफाई और कांवड़ मेला की सफाई के लिए 200 अतिरिक्त सफाई कर्मचारी लगाने के बाद भी स्थिति जस की तस है।