मलबे में तीन शव मिलने के बाद सरखेत में दहशत बढ़ गई है। सरकारी राहत न मिलने के कारण करीब 15 परिवार पलायन के लिए तैयार बैठे हैं। ये वह परिवार हैं, जिनके घर सैलाब में नहीं बहे, लेकिन रहने लायक भी नहीं बचे हैं। निचली मंजिल में पानी भरा है। दीवारें टूट चुकी हैं। सारा राशन खत्म हो गया। पीने को साफ पानी नहीं है। ऐसे में अब गांव छोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं है।
गांव की नीना देवी बताती हैं कि पीने के पानी के कनेक्शन कट गए हैं। गदेरे का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं। घर का राशन खत्म हो चुका है। मार्ग टूटने से राशन भी नहीं ला पा रहे हैं। जितेंद्र कहते हैं कि अब बारिश से डर लगने लगा है। अब तक सिर्फ सामने बह रही नदी की बाढ़ डराती थी, लेकिन इस बार पीछे के पहाड़ से सैलाब आ गया। इसकी कभी कल्पना नहीं की थी। रमेश सिंह पंवार ने कहा कि हमने सामान बांध लिया है। हालात यही रहे तो किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएंगे। हालांकि, जाना कहां है, यह पता नहीं है। यही हाल थोड़ी दूर बसे ताछिला गांव का भी है। यहां कोई जान नहीं गई, लेकिन घर तबाह हो गए। सरकार से अभी तक यहां कोई मदद नहीं पहुंची है। गांव के लोग गंदा पानी पीकर बीमार हो रहे हैं।
फाउंडेशन का लोगो... आपदा में मदद के लिए आगे आएं
सरखेत और ताछिला जैसे आपदाग्रस्त गांवों के कई घरों में राहत नहीं पहुंच पा रही है। अमर उजाला फाउंडेशन ऐसे जरूरतमंदों की मदद के लिए एक बार फिर आगे आया है। अमर उजाला फाउंडेशन अपनी तरफ से राहत सामग्री का इंतजाम कर रहा है। यदि आप भी इन जरूरतमंदों की मदद करना चाहते हैं तो आटा, चावल, तेल, नमक, मसाले जैसे राशन के जरूरी सामान अमर उजला देहरादून कार्यालय के नीचे लिखे पते तक पहुंचा सकते हैं। यह मदद सामग्री हम अपने वाहनों से जरूरतमंदों तक पहुंचाएंगे। 8392945713 पर संपर्क कर आप राहत सामग्री सीधे भी जरूरतमंदों तक पहुंचा सकते हैं। अमर उजाला आपकी मदद के लिए हर वक्त तैयार है।
आपदा के जख्म ने दिया पलायन का दंश
वर्ष 2014 में आई आपदा से मिले जख्म अभी पूरी तरह से भरे भी नहीं थे कि बीती 19 अगस्त को एक बार फिर कुदरत ने अपना कहर बरपा दिया। हम बात कर रहे हैं बांदल घाटी क्षेत्र की जहां पिछले आठ सालों से बादलों की जरा सी गड़गड़ाहट लोगों की रातों की नींद छीन लेती है। थोड़ी सी बारिश होती है तो इस क्षेत्र के लोग रतजगा करने को मजबूर हो जाते हैं। अब तो आलम यह है कि कई परिवार अपना आशियाना छोड़ यहां से पलायन के लिए तैयार हैं। हालांकि, वह यहां से कहां जाएंगे यह उन्हें भी पता नहीं है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि 2014 की आपदा के बाद से वह बरसात के मौसम में कभी भी चैन की नींद नहीं सोए। हर वक्त यही डर लगा रहता है कि कब फिर से कुदरत अपना कहर बरपा दे। बीते दिनों आपदा का शिकार हुए कुछ लोगों को तो सरकार ने मदद दी, लेकिन कई परिवार अब भी ऐसे हैं जिनकी कोई सुध नहीं ले रहा है। इन परिवारों के घर, खेती व दुकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। शायद इसीलिए यह सरकार की नजर में मदद के पात्र नहीं हैं और उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया गया है।
सरखेत निवासी रामकिशन ने बताया कि आपदा में उनके मकान का भी एक हिस्सा बह गया। वह इस आपदा में इसलिए बच गए क्योंकि वह खतरे को भांपते हुए रातभर जाग रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके अलावा भी नदी किनारे बहुत से मकान हैं। बारिश होते ही इन सभी घरों के लोग एकत्रित होकर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाते हैं। वहीं सरखेत निवासी गोविंद सिंह, विक्रम सिंह, पंचम सिंह का घर व खेती भी इस आपदा में तबाह हो गई। कहीं से कोई मदद न मिलने के कारण अब इन परिवारों ने थोड़ी आवाजाही शुरू होते ही पलायन करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि अब यहां रहना खतरे से खाली नहीं है। दो बार बड़ी आपदा झेल चुके हैं, अब जख्म सहने की ताकत नहीं है। कहीं से काई मदद भी नहीं मिल रही है। ऐसे में यहां से चले जाना ही बेहतर है।
ना पहुंच रहा प्रशासन ना ही मिल रही कोई मदद
सरखेत के आगे आवाजाही पूरी तरह से बंद है। यहां घंतूसेरा, डूमकोट, टापूसेरा में नदी किनारे बसे कई घरों को काफी नुकसान हुआ है। नदी का स्तर भी कम नहीं हो रहा है। घर में कुछ बचा नहीं हैं, लिहाजा यहां नदी किनारे बसे परिवार ऊंचाई पर स्थित घरों में शरण लिए हुए हैं। घंतूसेरा निवासी विनोद कैंत्यूरा ने बताया कि यहां अभी तक न तो प्रशासन पहुंचा हैं और न ही कोई राहत सामग्री। बताया कि सड़क न होने से कारण लोगों को जंगल की चढ़ाई से होते हुए राशन समेत अन्य जरूरी सामान के लिए सरखेत, मालदेवता पहुंचना पड़ रहा है।
हमारी दुकान बह गई है। स्कूल भी दब गया है। पापा के पास पैसे भी नहीं हैं कि यहां से कहीं चले जाएं। अब यहां नहीं रहना है। बारिश में सब कुछ बर्बाद हो गया है। -हिमांशु, सरखेत
अधिकतर घर बर्बाद हो चुके हैं। जिनका सामान बचा है वह भी सड़क किनारे आकर झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं। 2014 में भी इसी तरह की आपदा आई थी। इसके बाद से हर साल जब बारिश आती है तो सब डर जाते हैं। हम यहां से जाना चाहते हैं। लेकिन, कोई मदद के लिए नहीं आ रहा है। -संजय पंवार, सरखेत
हमारा छोटा सा होटल था। इसी से हम परिवार का भरण-पोषण करते थे। मगर अब यह भी नहीं रहा। हमारे पास यहां से जाने के लिए पैसे भी नहीं बचे हैं। हम बहुत परेशान हैं। किसी की मदद का इंतजार कर रहे हैं। यदि कोई मदद करे तो हम यहां से चले जाएंगे। -मीना पंवार, सरखेत