उत्तराखंड कई ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है। राजधानी दून से 60 किलोमीटर दूर कालसी में जहां सम्राट अशोक के 14 राजाज्ञाओं वाला शिलालेख राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक के तौर पर देश-दुनिया में चर्चित हैं। वहीं लाखा मंडल स्थित शिव मंदिर, हनोल स्थित महासू देवता का मंदिर, सहस्रधारा रोड कलिंगा (खलंगा), जगतग्राम स्थित उत्खनित स्थल भी कई ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के 3636 स्मारकों को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारकों के तौर पर चिह्नित किया गया है। इन स्मारकों में 100 स्मारकों को आदर्श स्मारकों का दर्जा प्राप्त है। इन आदर्श स्मारकों में से पांच स्मारक उत्तराखंड में हैं। इनमें अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर मंदिर, अल्मोड़ा का कटारमल सूर्य मंदिर, गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर, देहरादून जिले का लाखा मंडल स्थित शिव मंदिर और बागेश्वर स्थित बैजनाथ मंदिर समूह को आदर्श स्मारकों की सूची में शामिल किया है। पुरातत्व विशेषज्ञों की मानें तो कालसी स्थित अशोक शिलालेख के जरिये मौर्य वंश के सम्राट अशोक (273 ईसा पूर्व- 232 ईसा पूर्व) ने इस शिलालेख के माध्यम से जीव हत्या को निषेध बताया है। साथ ही इसके जरिए धर्म का भी प्रचार किया है। इसके अलावा अधिक से अधिक पौधरोपण, माता-पिता एवं गुरू का सम्मान करने, सहनशीलता, दयालुता का भी संदेश दिया है। इस शिलालेख में पांच यवन राजाओं का भी वर्णन किया गया है।
धार्मिक विरासत समेटे हुए हैं महासू मंदिर
जौनसार बावर क्षेत्र के हनोल स्थित महासू मंदिर को पुरातत्व विभाग ने राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक की श्रेणी में रखा है। हूण भट्ट की ओर से स्थापित इस मंदिर में चार देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। जिन्हें महासू, वासिक, पवासी व चालदा के नाम से पूजा जाता है। तीन देवता की मूर्तियां मंदिर में स्थापित रहती हैं। जबकि चौथे भाई चालदा देवता महासू क्षेत्र में भ्रमण करते रहते हैं। मंदिर के मूल प्रासाद का निर्माण नौवीं शताब्दी में किया गया है। वास्तुकला के लिहाज से मंदिर स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना है।
देवभूमि के राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक
पुरातत्वविद् डॉ. राजीव पांडे के मुताबिक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से देवभूमि में 42 स्मारकों को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक का दर्जा दिया है। जिनमें कलिंगा स्मारक (खलंगा) देहरादून, कालसी स्थित अशोक शिलालेख, जगतग्राम स्थित अश्वमेध स्थल, लाखामंडल स्थित शिव मंदिर, रुड़की में अंग्रेजों का कब्रिस्तान, उत्तरकाशी में खनित स्थल पुरोला, गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर, आदिबदरी, हनोल स्थित महासू मंदिर, अल्मोड़ा के द्वाराहाट स्थित मृत्युंजय मंदिर समूह, बदरीनाथ मंदिर समूह, कटारमल स्थित सूर्य मंदिर, चंपावत में बालेश्वर मंदिर समूह, गुफा मंदिर पाताल भुवनेश्वर, गंगोलीहाट स्थित उर्त्कीण नौला, नैनीताल में वैराट पट्टन ढिकुली, सीमाबनी, मनियान मंदिर समूह समेत 42 राष्ट्रीय स्मारक शामिल हैं।
देश में 36 विश्वदाय संपदा
पुरातत्व विज्ञानी डॉ. राजीव पांडे के मुताबिक देश में कुल 36 ऐसे पुरातात्विक महत्व के स्थल हैं जिन्हें विश्वदाय संपदा का दर्जा हासिल हैं। इनमें 28 सांस्कृतिक धरोहर हैं। जबकि आठ प्राकृतिक स्थल शामिल हैं। जहां तक सांस्कृतिक धरोहरों का सवाल है तो अजंता एलोरा की गुफाएं, चांपानेर पावागढ़, आगरा का किला, ताजमहल, फतेहपुर सीकरी आगरा, कोणार्क का सूर्य मंदिर, गोआ का गिरजाघर, महाबलीपुरम मंदिर समूह, खजुराहो मंदिर समूह, सांची स्तूप, भीमवेटका के शैलचित्र, जंतरमंतर जयपुर, दार्जिलिंग हिमालयन रेल, नालंदा महाविहार, कुतुबमीनार, लाल किला नई दिल्ली, बोधगया का मंदिर, हुमायूं का मकबरा को सांस्कृतिक विश्व धरोहर में शामिल किया है। जबकि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, मानस अभ्यारण्य, कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल प्रदेश, नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान एवं फूलों की घाटी उत्तराखंड को सांस्कृतिक धरोहर की श्रेणी में शामिल है।
क्यों मनाया जाता है विश्व धरोहर दिवस
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। जबकि 19 से 25 नवंबर के बीच विश्व धरोहर सप्ताह का आयोजन किया जाता है। धरोहर दिवस आयोजित करने का मकसद देश में अवस्थित राष्ट्रीय स्मारकों को संरक्षित करने के साथ ही आने वाली पीढ़ी को हस्तगत व समर्पित करना है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से उत्तराखंड में 42 स्मारकों को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया गया है। इसके अलावा राज्य सरकार की ओर से भी 71 स्मारकों को राज्य संरक्षित स्मारक के तौर पर चिह्नित किया है। जहां तक विश्वदाय संपदा का सवाल है तो नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी को विश्व धरोहर का दर्जा हासिल है। आने वाली पीढ़ी अपने ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत को समझे और जानें इसी उद्देश्य से विश्व धरोहर दिवस का आयोजन किया जाता है।
- डॉ. आरके पटेल, प्रभारी अधीक्षण पुरातत्वविद्, उत्तराखंड