ब्यूरो/ अमर उजाला, हरिद्वार
स्वच्छ भारत मिशन के तहत साफ सफाई से लेकर कामकाज के तौर तरीकों को लेकर तमाम दावे किए जाते हैं। इसके बाद भी निकाय क्षेत्रों में काम करने वाले पर्यावरण मित्र (सफाई कर्मचारी) आज भी पारंपरिक तरीके से काम करते हैं। बिना सुरक्षा उपकरण के जान जोखिम में काम करने को मजबूर हैं।
स्वच्छ भारत मिशन का नारा देने के बाद भी हवा-हवाई बातें ज्यादा हो रही हैं। जबकि ढर्रा वही पुराना घिसापिटा है। जिन सफाई कर्मचारियों के जिम्मे स्वच्छ भारत मिशन है उनके जीवन और काम करने के तौर तरीके में किसी प्रकार का बदलाव दो नहीं हुआ है। नंगे पांव, बिना दस्ताने, मास्क के नालियों व गडरों में घुसकर सफाई करने वाले कर्मचारी अनेक प्रकार की बीमारियों के शिकार होकर 40 साल में ही बूढ़े हो रहे हैं। संविदा पर कार्यरत सफाई कर्मचारियों को प्रतिमाह पारिश्रमिक का भुगतान तक समय पर नहीं होता है। आबादी और एरिया बढ़ रहा है और सफाई कर्मचारियों की संख्या घटती जा रही है। जो कर्मचारी सेवानिवृत्त होता जा रहा है उस पद को ही मृत घोषित किया जा रहा है। नगर निगम का जो नया ढांचा बना है उसमें सफाई कर्मचारी का नाम बदलकर पर्यावरण मित्र रख दिया गया है, परंतु पर्यावरण मित्र को उसी पुराने सिस्टम से काम करना पड़ रहा है। सफाई कर्मियों की कमी के चलते नगर निगम का जो पुराना 30 वार्डों का क्षेत्र है, उनके अंदर लगभग 40 नई कालोनियों में नियमित सफाई की व्यवस्था ही नहीं है।
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नगर निगम अपने मौजूदा संसाधनों से बेहतर करने में लगा है। सफाई कर्मचारियों के स्वास्थ्य के प्रति भी ध्यान दिया गया है। पहली बार स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का आयोजन कर 300 से अधिक कर्मचारियों की जांच कराई गई है। सफाई और कूड़े का निस्तारण में निरंतर सुधार किए जाने की जरूरत है। कर्मचारियों को आवश्यक सफाई उपकरण की भी व्यवस्था की जाएगी। शहर में प्रतिदिन लाखों तीर्थ यात्रियों का आना जाना होता है इस हिसाब से संसाधनों को बढ़ाने की जरूरत है।
- डा. ललित नारायण मिश्रा नगर आयुक्त