ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
स्थानीय बोली-भाषा को बढ़ावा देने के सरकार के दावों की हकीकत राजपुर रोड स्थित भाषा संस्थान बयां कर रहा है। बोली-भाषा के उत्थान के नाम पर सिर्फ झांसा दिया जा रहा है। स्थिति यह है कि संस्थान में न तो स्थायी निदेशक हैं न ही कर्मचारी। स्थापना के बाद से ही कामचलाऊ व्यवस्था के तहत संस्थान संचालित किया जा रहा है।
राज्य गठन के 17 साल बाद भी उत्तराखंड की बोली-भाषा को राजभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है। जबकि, गढ़ राजाओं और चंद शासनकाल में राजभाषा रही गढ़वाली, कुमाऊंनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए पर्याप्त साहित्य उपलब्ध हैं। लेकिन इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने और शासकीय मान्यता के लिए भाषा संस्थान की ओर से ठोस प्रयास नहीं किए जा सके। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि एक भी नियमित कर्मचारी नहीं हैं। संविदा और कामचलाऊ व्यवस्था के तहत संस्थान का संचालन किया जा रहा है। सचिव भाषा एवं संस्कृत ऊषा शुक्ला को इसके निदेशक का अतिरिक्त चार्ज दिया गया है। इसके अलावा सहायक निदेशक, वैयक्तिक सहायक, प्रवर सहायक, प्रकाशन अधिकारी, शोध अधिकारी, सहायक शोध अधिकारी सभी पद रिक्त हैं। संस्थान में गिनती के जो कर्मचारी हैं वे भी संविदा पर हैं।
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संस्थान में एक भी नियमित कर्मचारी और अधिकारी नहीं है, लेकिन अब संस्थान का अधिनियम कैबिनेट में पास हो चुका है। नए ढांचे से भाषा संस्थान को स्थायी पद मिलेंगे, वहीं अलग-अलग अकादमी एकीकृत होंगी।
-डीएस पुंडीर, उपनिदेशक, भाषा संस्थान