प्रदेश की 108 एंबुलेंस बंदी की कगार पर है। एंबुलेंस चलाने वाली कंपनी के पास बजट न होने से न तो एंबुलेंस की रिपेयरिंग हो पा रही है और न ही कर्मचारियों को वेतन मिल पा रहा है। कंपनी की ओर से कई बार शासन से बजट की मांग की गई है, लेकिन बजट का इंतजाम नहीं हो सका है।
प्रदेशभर में 108 एंबुलेंस सेवा में करीब 800 कर्मचारी हैं। इनमें पायलट और इमरजेंसी मेंटीनेंस टेक्नीशियन भी शामिल हैं, लेकिन इन कर्मचरियों को तीन माह से वेतन नहीं मिल रहा है।
वेतन न मिलने की वजह से कर्मचारी बेहद आर्थिक तंगी में आ गए हैं। कर्मचारियों के घर में खाने के लाले हैं। यहां तक की ऑफिस तक जाने का खर्च भी वहन नहीं कर पा रहे हैं।
हाल ही में स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में नए वाहनों पर चर्चा हुई। उम्मीद है कि जल्द बजट रिलीज हो जाएगा। हफ्तेभर में कंपनी को मेंटीनेंस के लिए बजट उपलब्ध करा दिया जाएगा।
- डा. डीएस रावत, डीजी हेल्थ
दौड़ रहीं 50-60 खटारा एंबुलेंस
2008 में जीवीकेईएमआरआई कंपनी ने 90 एंबुलेंस के साथ इस सेवा की शुरुआत की
- फोटो : अमर उजाला
वहीं कई एंबुलेंस निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक किलोमीटर दौड़ चुकी हैं। कई एंबुलेंस के टायर घिस चुके हैं, लेकिन कंपनी को चार महीने से मेंटीनेंस मद का बजट भी नहीं मिला है। ऐसे में पहाड़ी रास्तों पर दौड़ रहीं खटारा एंबुलेंस कभी भी हादसे का सबब बन सकती हैं।
इसके अलावा नए वाहनों का प्रस्ताव भी शासन स्तर पर अटका है। वर्ष 2008 में जीवीकेईएमआरआई कंपनी ने 90 एंबुलेंस के साथ इस सेवा की शुरुआत की थी। वर्तमान में कंपनी के बेड़े में 139 एंबुलेंस हैं, जो प्रदेश के सभी 13 जिलों में सेवाएं दे रही हैं। इनमें से 50-60 गाड़ियां ऐसी हैं, जो पांच लाख किमी तक दौड़ चुकी हैं, जबकि इनकी क्षमता मात्र डेढ़ लाख किमी का सफर तय करने की है।
इसके बाद वाहन को निष्प्रोज्य माना जाता है, लेकिन इसके बाद भी वाहन दौड़ रहे हैं। वर्ष 2013 से कंपनी लगातार शासन को नई एंबुलेंस के लिए प्रस्ताव भेज रही है, लेकिन चार साल बाद भी शासन ने बजट उपलब्ध नहीं कराया है।
नए वाहनों के लिए कंपनी की ओर बीते चार साल से शासन को प्रस्ताव भेजा जा रहा है। चार माह से मेंटीनेंस के लिए मिलने वाला बजट भी नहीं मिला है। इसके चलते वाहनों के रख-रखाव में परेशानी आ रही है।
- मनीष टिक्कू, हेड 108 आपातकालीन सेवा