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प्रसूताओं, नवजातो की जिंदगी पर सरकारी तंत्र की अव्यस् था भारी

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ब्यूरो/अमर उजाला।
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देहरादून। दून महिला अस्पताल में सरकार और स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी प्रसूताआें और नवजातों पर भारी पड़ रही है। हालत यह है कि इस अस्पताल में मानकों के अनुसार न पर्याप्त चिकित्सक हैं और न अन्य स्टाफ। इतना ही नहीं बेड की संख्या कम होने से महिला मरीजों को भर्ती करने में प्रबंधन को भारी परेशानियों को सामना करना पड़ रहा है। जबकि यहां प्रतिदिन औसतन 300 महिला मरीज इलाज करवाने पहुंचती हैं।
इसमें से 30-40 महिलाओं को प्रसव के लिए भर्ती किया जाता है। 60 महिला मरीजों को अन्य बीमारियों के चलते भर्ती करना होता है। इतने मरीजों के इलाज के लिए अस्पताल में मात्र पांच विशेषज्ञ डॉक्टर व तीन रेजीडेंट डॉक्टरों की तैनाती की गई है। पांच विशेषज्ञ डाक्टरों में दून मेडिकल कॉलेज की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. चित्रा जोशी और सीएमएस डॉ. मीनाक्षी जोशी भी शामिल हैं। इन दोनों के पास मरीजों के इलाज के साथ-साथ अन्य विभागीय कार्य निपटाने की भी जिम्मेदारी है।
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सीएमएस डॉ. मीनाक्षी जोशी ने बताया कि दून महिला अस्पताल को जब जिला अस्पताल का दर्जा हासिल था तो इस अस्पताल के लिए 111 बेड स्वीकृत थे। महिला अस्पताल को मेडिकल कालेज में समायोजित करने के बाद मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के मानकों के अनुरूप अस्पताल में अब 60 बेड की स्वीकृत हैं। इनमें 30 बेड प्रसूताओं के लिए आरक्षित हैं। जबकि 30 बेड सामान्य इलाज के लिए भर्ती महिलाओं के लिए रखे गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों का आंकड़ा ही 150 के आसपास रहता है। जिसकी वजह से प्रबंधन को अस्पताल के बरामदों में बेड लगवाने पड़ते हैं।
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गांधी शताब्दी अस्पताल में नहीं जा रहे मरीज
दून महिला अस्पताल में प्रसूता को फर्श पर प्रसव होने और नवजात की मौत के बाद शासन के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय में मदर एंड चाइल्ड केयर विंग (एमसीएच) स्थापित की है। इसके लिए वहां प्रसव की पूरी व्यवस्था की है। बावजूद इसके गांधी शताब्दी अस्पताल में महिलाएं इलाज कराने और प्रसव कराने नहीं जा रही हैैं।
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