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एक्सप्लेनर: गोल-अंडाकार या टेढ़े-मेढ़े, क्रिकेट के मैदान अलग-अलग आकार के क्यों होते? उदाहरण के साथ जानें वजह

Sat, 05 Sep 2026 08:11 AM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

क्रिकेट के मैदानों का आकार और सीमा एक जैसी नहीं होती, क्योंकि क्रिकेट के नियम पिच के लिए सटीक माप तय करते हैं, लेकिन पूरे आउटफील्ड को फुटबॉल की तरह एक निश्चित आकार में बांधने की कोशिश नहीं करते। स्टेडियम की जमीन, पुरानी वास्तुकला, दूसरे खेलों के लिए इस्तेमाल और सुरक्षा संबंधी नियम मिलकर मैदान का आकार तय करते हैं। यही विविधता क्रिकेट को रणनीतिक रूप से भी खास बनाती है।
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क्रिकेट के मैदान अलग अलग आकार के क्यों - फोटो : Twitter
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विस्तार
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अगर आप फुटबॉल देखते हैं तो ज्यादातर स्टेडियम में मैदान का मूल आकार एक जैसा नजर आता है। टेनिस में तो कोर्ट के आयाम बिल्कुल तय होते हैं, लेकिन क्रिकेट में तस्वीर अलग है। कहीं मैदान लगभग गोल दिखता है, कहीं अंडाकार, कहीं एक तरफ लंबी बाउंड्री तो दूसरी तरफ काफी छोटी। यही वजह है कि मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (MCG), ईडन पार्क, लॉर्ड्स और भारत के बड़े स्टेडियम देखने में एक-दूसरे से काफी अलग लग सकते हैं।

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इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि क्रिकेट में पिच और पूरे मैदान के लिए एक जैसे आयाम तय नहीं किए गए हैं। पिच की लंबाई 22 गज यानी 20.12 मीटर होती है, लेकिन उसके चारों तरफ का आउटफील्ड किसी एक तय आकार का होना जरूरी नहीं है। हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि क्रिकेट के मैदान की बाउंड्री पूरी तरह मनमानी हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए आईसीसी ने बाउंड्री को लेकर स्पष्ट सीमाएं तय कर रखी हैं।

कौन सा मैदान क्यों अलग है?

मैदान खासियत मैदान का आकार अलग क्यों है?
मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड बहुत बड़ा और अंडाकार क्रिकेट के साथ
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ऑस्ट्रेलियन रूल्स फुटबॉल
जैसे खेलों के लिए भी
विकसित हुआ
ईडन पार्क, ऑकलैंड अपेक्षाकृत छोटा/संकरा जमीन और
दूसरे खेलों की
जरूरतों के कारण
इसकी आउटफील्ड अलग है
लॉर्ड्स, लंदन ढलानदार आउटफील्ड, चौकोर पुराने मैदान और
प्राकृतिक भू-आकृति
का असर
सेंट जॉर्ज पार्क, पोर्ट एलिजाबेथ असामान्य बाउंड्रीज आसपास की सड़क
और शहरी ढांचे ने
जगह सीमित की
चिन्नास्वामी स्टेडियम, बंगलूरू छोटी बाउंड्री के लिए जाना जाता है शहर के बीच स्थित
मैदान और उपलब्ध
जमीन की सीमा
होल्कर स्टेडियम, इंदौर अपेक्षाकृत छोटी स्क्वायर बाउंड्री मैदान की
कॉम्पैक्ट संरचना

अलग अलग स्टेडियम के अलग अलग आकार - फोटो : twitter
22 गज की पिच तय, लेकिन बाउंड्री क्यों नहीं?
 
  • क्रिकेट का सबसे महत्वपूर्ण निश्चित माप पिच है। विकेटों के बीच की दूरी 22 गज यानी 20.12 मीटर होती है। गेंदबाजी क्रीज, पॉपिंग क्रीज और स्टंप्स की स्थिति भी नियमों से तय होती है, लेकिन इसके बाद मैदान कितना फैलेगा, उसकी सीमा कहां होगी और उसका आकार कैसा होगा, इसमें काफी लचीलापन है।
  • अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की मौजूदा आईसीसी परिस्थितियों में लक्ष्य यह है कि उपलब्ध जगह का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए। बाउंड्री पिच के केंद्र से 90 गज (82.29 मीटर) से ज्यादा दूर नहीं हो सकती और सामान्य तौर पर छोटी बाउंड्री 65 गज (59.43 मीटर) से कम नहीं होनी चाहिए। 65 गज की सीमा का मतलब यह नहीं है कि हर मैदान पर हर दिशा में बाउंड्री बिल्कुल 65 गज की होनी चाहिए। यह न्यूनतम सीमा है, जबकि उपलब्ध जगह के अनुसार बाउंड्री इससे काफी बड़ी हो सकती है।

नरेंद्र मोदी स्टेडियम - फोटो : twitter
क्या हर अंतरराष्ट्रीय मैदान पर 65 मीटर की बाउंड्री जरूरी है?
नहीं। यहीं क्रिकेट के इतिहास की दिलचस्प भूमिका सामने आती है। आईसीसी के नियमों में पुराने अंतरराष्ट्रीय मैदानों के लिए अपवाद मौजूद है। अगर कोई ऐसा मैदान पहले से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की मेजबानी के लिए स्वीकृत था और नई न्यूनतम सीमा को पूरा नहीं कर सकता, तो उसे छूट मिल सकती है। ऐसी स्थिति में बाउंड्री को उपलब्ध जगह के भीतर जितना संभव हो उतना बड़ा रखने का प्रयास किया जाता है।

इसलिए पुराने मैदानों के मामले में केवल यह कहना सही नहीं होगा कि 65 मीटर से छोटी बाउंड्री अवैध है। इतिहास और मैदान की मौजूदा संरचना भी मायने रखती है। यही कारण है कि पुराने प्रतिष्ठित मैदानों में आज भी ऐसे आयाम देखने को मिल सकते हैं जो नए स्टेडियमों के आदर्श मानकों से अलग हैं।

लॉर्ड्स - फोटो : twitter
मैदान गोल या अंडाकार कैसे हो गए?
इसका जवाब काफी हद तक क्रिकेट के इतिहास में छिपा है। कई मशहूर क्रिकेट मैदान शुरुआत से सिर्फ क्रिकेट के लिए नहीं बनाए गए थे। खासकर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में मैदानों का इस्तेमाल दूसरे खेलों के लिए भी होता रहा है। एमसीजी इसका शानदार उदाहरण है। ऑस्ट्रेलियन रूल्स फुटबॉल के लिए बड़े अंडाकार मैदान की जरूरत होती है। इसलिए क्रिकेट पिच के चारों ओर मौजूद विशाल आउटफील्ड का आकार फुटबॉल की जरूरतों से भी प्रभावित हुआ। यानी क्रिकेट की पिच भले ही बीच में 22 गज की रहे, लेकिन उसके चारों तरफ का मैदान उस जगह के इतिहास और दूसरे खेलों की जरूरत के अनुसार विकसित हो सकता है।

ईडन पार्क की कहानी क्यों अलग है?
न्यूजीलैंड का ईडन पार्क क्रिकेट और रग्बी दोनों के लिए जाना जाता है। रग्बी के मैदान की संरचना क्रिकेट के मैदान से अलग होती है। जब एक ही परिसर में अलग-अलग खेलों के लिए जगह का इस्तेमाल किया जाता है, तो क्रिकेट की बाउंड्री भी उपलब्ध जमीन के हिसाब से असामान्य दिखाई दे सकती है।

यही कारण है कि ईडन पार्क को क्रिकेट के उन मैदानों में गिना जाता है जहां बाउंड्री का संतुलन पारंपरिक अंडाकार क्रिकेट ग्राउंड जैसा नहीं दिखता, लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है, किसी एक दिशा में बाउंड्री की छोटी दूरी को देखकर पूरे मैदान को अवैध मान लेना गलत होगा। अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए लागू प्लेइंग-कंडीशंस और किसी मैदान की ऐतिहासिक स्वीकृति को साथ में देखना पड़ता है।

ईडन पार्क - फोटो : twitter
पुराने शहरों में बने मैदानों का भी बदला आकार?
आज कोई नया स्टेडियम बनाना हो तो इंजीनियर पहले जमीन का आकार, दर्शक क्षमता, सुरक्षा क्षेत्र और खेल की जरूरतों को ध्यान में रख सकते हैं, लेकिन क्रिकेट के कई ऐतिहासिक मैदान दशकों या सदियों पुराने हैं। उनके आसपास सड़कें, इमारतें, पार्क, रेलवे लाइन या अन्य संरचनाएं विकसित हो चुकी थीं। ऐसे में स्टेडियम को बाहर की ओर समान रूप से फैलाना हमेशा संभव नहीं था। इसलिए कई मैदानों की बाउंड्री एक दिशा में लंबी और दूसरी दिशा में छोटी हो गई। यानी मैदान का आकार सिर्फ खेल के नियमों का परिणाम नहीं है; यह शहर के विकास का इतिहास भी है।

लॉर्ड्स में सिर्फ आकार नहीं, ढलान बढ़ाती है परेशानी?
लंदन का लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड क्रिकेट के सबसे प्रसिद्ध मैदानों में है। यहां एक और खासियत है, आउटफील्ड की ऐतिहासिक ढलान। लॉर्ड्स का मैदान पूरी तरह समतल नहीं है। लगभग 2.5 मीटर की ऊंचाई का अंतर मैदान की सतह को एक अलग चरित्र देता है। इसका मतलब यह है कि क्रिकेट मैदान सिर्फ गोल या अंडाकार होने से ही अलग नहीं होते। उनकी सतह, ढलान, मिट्टी, आउटफील्ड और पिच की स्थिति भी खेल को प्रभावित कर सकती है।

अलग अलग स्टेडियम के अलग अलग आकार - फोटो : twitter
एक ही मैदान में बाउंड्री हमेशा एक जैसी क्यों नहीं होती?
यह क्रिकेट का बेहद दिलचस्प पहलू है। क्रिकेट ग्राउंड के भीतर स्क्वायर या पिचों का क्षेत्र होता है, जिसमें अलग-अलग पिच स्ट्रिप तैयार की जा सकती हैं। मैच के लिए जिस स्ट्रिप का इस्तेमाल किया जाता है, उसके केंद्र से बाउंड्री की दूरी मापी जाती है। इसलिए एक ही मैदान पर पिच की स्थिति बदलने से किसी दिशा में बाउंड्री की दूरी भी बदल सकती है।

इसी वजह से टीवी पर आप अक्सर देखते हैं कि कमेंटेटर कहते हैं- आज यहां स्क्वायर बाउंड्री छोटी है या सीधी बाउंड्री काफी लंबी है। यह सिर्फ स्टेडियम का आकार नहीं, बल्कि उस दिन इस्तेमाल की जा रही पिच और बाउंड्री की स्थिति से भी जुड़ा होता है। आईसीसी की शर्तों में भी दूरी को इस्तेमाल की जा रही पिच के केंद्र से मापने की बात स्पष्ट है।

द ओवल स्टेडियम - फोटो : twitter
बाउंड्री के आकार का मैच की रणनीति पर क्या असर पड़ता है?
यहीं से मैदान की ज्यामिति सीधे क्रिकेट की रणनीति बन जाती है। मान लीजिए किसी मैदान में लेग साइड की बाउंड्री 60 मीटर और ऑफ साइड की बाउंड्री 75 मीटर है। बल्लेबाज स्वाभाविक रूप से छोटी सीमा को निशाना बनाना चाहेगा।  गेंदबाज भी इसे समझता है। वह बल्लेबाज को उस दिशा में शॉट खेलने के लिए मजबूर करने के बजाय लंबी बाउंड्री की तरफ गेंद डाल सकता है। इससे कप्तान की फील्ड प्लेसमेंट भी बदलती है। यानी- छोटी बाउंड्री...ज्यादा बाउंड्री विकल्प...बल्लेबाज के लिए आकर्षक क्षेत्र, लंबी बाउंड्री...कैचिंग या रन रोकने की अलग रणनीति...गेंदबाज को अतिरिक्त मदद। इसीलिए टॉस के बाद कप्तान अक्सर मैदान के आयामों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाते हैं।

क्या बड़े मैदान पर छक्के लगाना हमेशा मुश्किल होता है?
जरूरी नहीं। मैदान की बाउंड्री दूरी महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला यही फैक्टर नहीं है। पिच की गति, आउटफील्ड की रफ्तार, हवा, गेंद की स्थिति, बल्लेबाज की ताकत और शॉट का कोण भी भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए किसी बड़े मैदान में तेज आउटफील्ड हो तो बल्लेबाज चौके के लिए गेंद को गैप में भेज सकता है। वहीं छोटी बाउंड्री वाले मैदान में भी धीमी पिच पर गेंद को हवा में भेजना आसान नहीं हो सकता। इसलिए 'छोटा मैदान हमेशा बल्लेबाज का मैदान कहना भी पूरी तरह सही नहीं है।

द रिवरसाइड क्रिकेट स्टेडियम - फोटो : twitter
आधुनिक स्टेडियम फिर ज्यादा एक जैसे क्यों दिखते हैं?
नई पीढ़ी के क्रिकेट स्टेडियमों में डिजाइन पहले से ज्यादा योजनाबद्ध है। इंजीनियरों के पास जमीन की मैपिंग, दर्शक क्षमता, सुरक्षा क्षेत्र और स्टेडियम की संरचना को पहले से डिजाइन करने की बेहतर तकनीक है। इसलिए कई आधुनिक मैदान अपेक्षाकृत ज्यादा सममित नजर आते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सभी आधुनिक मैदान बिल्कुल गोल या पूरी तरह समान बाउंड्री वाले हैं। क्रिकेट में उपलब्ध जगह और संबंधित प्रतियोगिता की प्लेइंग कंडीशंस के अनुसार मैदान की सीमा तय होती है। आईसीसी का मूल सिद्धांत भी यही है कि उपलब्ध जगह का अधिकतम संभव प्लेइंग एरिया इस्तेमाल किया जाए, साथ ही निर्धारित अधिकतम सीमा का पालन हो।

तो क्या क्रिकेट में मैदान की अलग-अलग आकृतियां कमजोरी हैं?
असल में यही क्रिकेट की खूबसूरती है। क्रिकेट में सिर्फ बल्लेबाज और गेंदबाज आमने-सामने नहीं होते। मैदान भी खेल का एक चरित्र बन जाता है। कहीं छोटी स्क्वायर बाउंड्री बल्लेबाज को पुल और कट खेलने के लिए प्रेरित करती है, कहीं लंबी सीधी बाउंड्री गेंदबाज को हवा में शॉट खेलने के लिए मजबूर करती है। कहीं ढलान खेल को प्रभावित करती है, तो कहीं तेज आउटफील्ड दो रन को तीन में बदल देती है। इसलिए क्रिकेट का मैदान केवल खेलने की जगह नहीं है। वह मैच की रणनीति का हिस्सा है।
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मेलबर्न स्टेडियम - फोटो : ICC
तो हम क्या कह सकते हैं?
क्रिकेट के मैदान अलग-अलग इसलिए दिखते हैं क्योंकि इस खेल का इतिहास बहुत पुराना है और इसके नियम पिच को सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, लेकिन पूरे आउटफील्ड को एक ही आकार में बांधने की व्यवस्था नहीं करते। पुराने शहरों की जमीन, दूसरे खेलों के लिए स्टेडियम का इस्तेमाल, ऐतिहासिक संरचनाएं और आधुनिक सुरक्षा नियम, सभी मिलकर मैदान का अंतिम आकार तय करते हैं। और यही वजह है कि एमसीजी का विशाल अंडाकार मैदान, ईडन पार्क की असामान्य सीमाएं और लॉर्ड्स की ढलान क्रिकेट को एक ऐसा खेल बनाती हैं जहां हर मैदान अपने साथ एक अलग रणनीतिक कहानी लेकर आता है।
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