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धोनी हुए पुराने, कोहली की स्टाइल ही नहीं सोच भी नई

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भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम के नए कप्तान विराट कोहली स्टाइल ही नहीं सोच भी अलग रखते हैं। बात मैदान के अंदर की हो या बाहर की। अब विराट ने यह कहकर नई चर्चा छेड़ दी है कि अंपायर निर्णय समीक्षा प्रणाली (डीआरएस) पर साथियों से विचार करने में क्या हर्ज है।
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इस प्रणाली को लेकर बीसीसीआई और पूर्व टेस्ट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी खुलकर विरोध करते रहे हैं। विराट ने कहा है कि वह विवादास्पद डीआरएस को लागू करने के बारे में साथियों के साथ खुलकर विचार-विमर्श करने को तैयार हैं।

वहीं, धोनी का शुरू से ही मानना रहा है कि डीआरएस फुलप्रूफ नहीं है इसको और विकसित किए जाने की जरूरत है। कोहली का मत है कि कम से कम इस पर विचार-विमर्श तो किया जा सकता है।
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कोहली का मत, खिलाड़ियों से राय लेने में हर्ज ही क्या है

डीआरएस पर टीम इंडिया के नए टेस्ट कप्तान विराट कोहली का कहना है कि "हम संग बैठें और गेंदबाजों से पूछे कि भई उनका इस बारे में क्या विचार है। बल्लेबाज इस बारे में क्या नजरिया रखते हैं।"

विराट का विचार बीसीसीआई के अब तक रहे अडिग रवैये से भी मेल नहीं खाता है। पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के कार्यकाल में बीसीसीआई ने इसका कड़ा विरोध किया जबकि इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इसका इस्तेमाल शुरू कर चुके थे।

आईसीसी का कहना है कि वह चाहती है कि सभी सदस्य देश इस प्रणाली का उपयोग करें लेकिन वह किसी बोर्ड को इसको मानने के लिए विवश नहीं कर सकती।

डीआरएस पर कोहली के साथ आईसीसी

आईसीसी के सीईओ डेव रिचर्डसन ने हाल ही में कहा था कि हम चाहते कि नियम सभी के लिए एक जैसे हों लेकिन तथ्य यह है कि हमारा एक सदस्य बोर्ड डीआरएस नहीं चाहता क्योंकि उसकी अपनी चिंताएं है।

उन्होंने कहा कि हजार डॉलर प्रति मैच का अनुमानित खर्च और यदि हॉट स्पॉट के चार कैमरे और शामिल कर लिए जाएं तो यही खर्च दस हजार डॉलर प्रति मैच और बढ़ जाता है।

आपको बता दें कि डीआरएस की प्रायोगिक शुरुआत भारत और श्रीलंका के बीच 2008 में हुई टेस्ट सीरीज में हुई थी। वनडे में इसे जनवरी 2011 में लागू किया गया था।
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पढ़ें, डीआरएस के फायदें और नुकसान

डीआरएस को लेकर कुछ अपवादः
• डीआरएस के 100 प्रतिशत सही होने की कोई गारंटी नहीं है।
•अंपायरों के निर्णय पर सवाल उठाना क्रिकेट के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ।
•महंगी प्रणाली है, अनावश्यक खर्च बढ़ाने से कोई फायदा नहीं।
•शुरुआती दौर में भारत के खिलाफ कई निर्णय गए जिससे अनुभव बेहद खराब रहा।

डीआरएस के फायदेः
•प्रणाली से सही फैसलों का प्रतिशत बढ़ा है। अनुमानित तौर पर यह 93 प्रतिशत से बढ़कर 98 प्रतिशत हो गया है।
•बल्ले और गेंद के बीच संतुलन बढ़ता है। अब बैट्समैन पैड से की जगह बल्ले का ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं।
•तकनीक से जो खर्च बढृता है वह वहन किया जा सकता है। वैसे भी प्रसारणकर्ता इसे अपने बजट में शामिल करता है।
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