यश ढुल उस दौरान सात या आठ साल के रहे होंगे जब उनके दादा जगत सिंह उनकी अंगुली पकड़कर पहली बार रणजी क्रिकेटर प्रदीप कोचर की अकादमी लेकर गए थे। उसके बाद ऐसा कोई दिन और मैच नहीं गया जब यश को अपने दादा का साथ नहीं मिला हो। दादा और पोते का रिश्ता अनोखे प्यार के बंधन में बंधा था। 2017 में यश के दादा स्वर्ग सिधार गए, लेकिन पिता विजय ढुल ने बेटे को दादा की यादों को ढाल बनाने का हौसला दिया। अगले ही दिन न सिर्फ यश मैदान में थे बल्कि उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले विजय मर्चेंट ट्राफी में पंजाब के खिलाफ शतक जड़ा फिर देश की अंडर-19 टीम में जगह बनाई और अंत में इसके कप्तान बनकर वेस्टइंडीज गए।
जब यश को विरोधी टीम ने कंधों पर उठा लिया
कोचर की अकादमी में पहुंचने पर यश का पहला प्यार बल्लेबाजी नहीं बल्कि मध्यम गति की गेंदबाजी थी, लेकिन कोच की पारखी नजरों ने उनके अंदर के छुपे बल्लेबाज को पकड़ा और बल्ले का मास्टर बना डाला। कोचर की अकादमी में यश के कोच मयंक निगम को याद है दिल्ली के नामी सोनेट क्लब के खिलाफ अंडर-16 का मैच था। यश की उम्र 12 साल की थी और वह सबसे छोटे थे। वह नंबर चार पर खेलने गए, लेकिन सारे बल्लेबाज सस्ते में आउट होने लगे। अकेले यश ऐसे थे जिन्होंने न सिर्फ बाउंड्रियां जड़ीं बल्कि पूरे 40 ओवर खेले। पारी के बाद सोनेट के क्रिकेटरों ने यश को कंधों पर उठा लिया।
हर शतक पर सौ रुपये का ईनाम
सचिन तेंदुलकर के कोच रमाकांत अचरेकर विकेट पर एक रुपया रखकर उन्हें विकेट नहीं खोने के लिए कहते थे। सचिन आउट नहीं होकर यह रुपया जीतते थे। इसी तरह यश को शतक बनाने पर उन्हें कोच कोचर और मयंक से ईनाम में सौ रुपये मिलते थे। मयंक खुलासा करते हैं कि यश ने न जाने कितने सौ रुपयों को अभी भी अपने पास संभालकर रखा है। पंजाब के खिलाफ विजय मर्चेंट ट्राफी में जब उन्होंने 188 रन बनाए तब उन्होंने उसे पांच सौ रुपये दिए। यह भी उसने संभालकर रख रखे हैं।
पिता नहीं खेले पर बेटे ने पूरा किया सपना
यश के पिता विजय ढुल खुद क्रिकेटर थे। वह दिल्ली क्रिकेट लीग में बतौर हरफनमौला सुभानिया खेले। घर में उनके बल्ले और गेंद पड़े रहते थे तो यश इनके साथ खेलता रहता था। एक दिन उसकी मां ने कहा कि इसकी क्रिकेट में रुचि है। उसके बाद ही यश को उसके दादा अकादमी लेकर गए। विजय खुलासा करते हैं कि बेटे ने उनका सपना पूरा किया है। वह तो ऊंचे दर्जे की क्रिकेट नहीं खेले, लेकिन बेटा खेल रहा है। उम्मीद है कि वह एक न एक दिन सीनियर टीम में जगह बनाएगा। विजय ने तो यश को क्रिकेटर बनाने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी और सलाहकार का काम किया।
टीम संक्रमित पर नहीं टूटा यश का हौसला
विजय के मुताबिक वेस्टइंडीज में यश समेत टीम के कुछ सदस्यों के संक्रमित होने की बात सुनकर उन्होंने बेटे को वीडियो कॉल किया। वह थोड़ा चिंतित थे, लेकिन बेटे ने उनकी सारी चिंताएं दूर कर दीं। यश ने उनसे कहा कि चिंता की कोई बात नहीं चार से पांच दिन ठीक होने में लगेंगे। उन्हें विश्वास है टीम अंतिम आठ में जरूर पहुंचेगी। उसके बाद सभी मोर्चा संभालेंगे। ठीक वैसा ही हुआ।