इस बात को बीते कई साल हो चुके हैं, लेकिन आज तक मेरे जेहन में यादें ताजा हैं। एक मई, 1999 की बात है, उस समय मैं नौ साल की थी।
पापा मुझे हैदराबाद के एलबी स्टेडियम में बैडमिंटन एकेडमी ज्वाइन कराने के लिए ले गए थे। स्टेडियम में एक खिड़की पर 8 से 10 साल के बच्चों की बड़ी भीड़ जमा थी। इस खिड़की पर लिखा हुआ था-समर ट्रेनिंग कोर्स इन क्रिकेट। बच्चे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे- सचिन सचिन।
मैं बहुत हैरान थी, कई सवाल मन में उठने लगे थे। मैंने पूछा, पापा ये सचिन कौन है? ये लोग क्यों सचिन-सचिन चिल्ला रहे हैं? मेरे सवालों को सुनकर पापा के चेहरे की वो मुस्कान मुझे आज भी याद है।
पापा ने मुझे बताया कि सचिन भारत के महान बल्लेबाज हैं, इसलिए हर कोई उनके जैसा बनना चाहता है। इस तरह भारत के इस महान बेटे के बारे में मुझे पता चला। बस तभी से वो मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहे।
हालांकि उनसे मिलने का मौका मुझे पिछले साल ही मिला। मैं लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर लौटी थी और हैदराबाद में एक कार्यक्रम में उन्होंने बीएमडब्ल्यू स्पोर्ट्स कार की चाबी मुझे उपहार स्वरूप दी थी। मैं हैरान थी क्योंकि इतना महान खिलाड़ी मेरी तारीफें करता नहीं थक रहा था।
उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों से भी कहा कि अगर आपको सफलता हासिल करनी है तो साइना के जितनी प्रतिबद्धता दिखाओ और मेहनत करो। वो मेरी तारीफें किए जा रहे थे और मैं हैरानीभरी नजरों से उन्हें देख रही थी।
उन्होंने मेरे मम्मी-पापा की भी खूब सराहना की। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि सफलता के आसमान पर विराजमान किसी व्यक्ति के पांव आखिर कैसे जमीन पर रह सकते हैं। मगर शायद उनकी इसी एक खासियत ने उन्हें दूसरों से अलग खड़ा किया है। इसलिए हम सब उन्हें इतना ज्यादा प्यार और सम्मान करते हैं। उनकी प्रतिबद्धता और महानता की वजह से ही हम उन्हें भगवान कहते हैं। मैं उनके सुनहरे भविष्य की कामना करती हूं।
(अमित कुमार से बातचीत पर आधारित)