अब यहां से राहुल द्रविड़ की असल परीक्षा शुरू होती है, उन्होंने पांच साल जी-तोड़ मेहनत की। इस दौरान 50 से ज्यादा प्रथम श्रेणी मैच खेले और 15 से ज्यादा शतक जमाए तब कहीं जाकर इंडियन क्रिकेट टीम की कैप पहनने के करीब पहुंचे। संघर्ष फिर भी खत्म नहीं हुआ। इस बीच वह पत्राचार से एमबीए भी करने लगे। चेन्नई जाकर पांच और क्रिकेटर्स के साथ किराए के कमरे में रहे ताकि टर्फ विकेट पर खेलने का अनुभव मिल सके। द्रविड़ का लंबा इंतजार 1996 में खत्म हुआ जब 23 साल की उम्र में उन्हें इंग्लैंड दौरे के लिए चुना गया।
1983 विश्व कप जीत की कहानी सुनते हुए बड़े होने वाले द्रविड़ को अपना पहला मैच खेलने के लिए लॉर्ड्स से बेहतर जगह नहीं मिल सकती थी। यही वो मैदान था जो क्रिकेट के न जाने कितने ही बेहतरीन मौकों का गवाह बन चुका था। उनका पहला मैच किस्मत की बात थी। मैच से ठीक एक दिन पहले संजय मांजरेकर चोटिल हो गए और पूरी सीरीज भर बाहर बैठने वाले द्रविड़ की किस्मत खुल गई। बेहद कम लोगों को पता होगा कि सौरव गांगुली ने भी इसी मैच से डेब्यू किया था। जैमी जब बल्लेबाजी करने उतरे तो टीम मुश्किल में थी। ऐसे विपरित हालातों में अपना पहला मैच खेल रहे द्रविड़-गांगुली ने मिलकर संकट टाला। सौरव ने 131 रन बनाए और दोनों ने मिलकर 94 रन की साझेदारी की। द्रविड़ डेब्यू टेस्ट में शतक से चूक गए और 95 रन बनाकर आउट हुए। इस मैच के बाद राहुल द्रविड़ ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
टीम इंडिया में एंट्री से पहले खुद को घिसने वाले द्रविड़ दिमागी तौर पर बेहद शांत क्रिकेटर थे। वो टेस्ट-वन-डे में बराबर रूप से गेंदबाजी आक्रमण को कुंद करना जानते थे। अपने पूरे करियर में वह विवादों से दूर रहे। 2004 में बॉल टेंपरिंग मामले में मैच फीस की 50 प्रतिशत कटौती वो एकमात्र मौका था, जब राहुल को मैदान पर किसी बात की कोई सजा मिली। सौरव गांगुली को कप्तानी से हटाने के बाद 2005 में द्रविड़ को टीम की बागडोर सौंपी गई। ग्रेग चैपल से विवादों के बाद गांगुली से कप्तानी छीनी गई थी। द्रविड़ पर आरोप लगे कि उन्होंने गुरू ग्रेग को मनमानी करने दी। मगर द्रविड़ ने पूरे विवाद में हमेशा चुप्पी साधी रही। हालांकि यह दुखद ही रहा कि उनकी कप्तानी में 2007 विश्व कप खेलने पहुंची टीम इंडिया पहले दौर में ही बाहर हो गई।
राहुल द्रविड़ ने 41 साल में प्रवेश करने के कुछ हफ्ते बाद ही 9 मार्च 2012 को संन्यास की घोषणा कर दी। कुछ माह बाद जब टीम इंडिया ने बेंगलुरु में टेस्ट मैच खेला तो वहां बीसीसीआई ने उन्हें सम्मानित किया। द्रविड़ ने हमेशा चकाचौंध से दूर रहना पसंद किया। 36 शतक, 63 अर्धशतक के बूते 13 हजार से ज्यादा रन बनाने वाले राहुल निर्विवाद रूप से तीसरे नंबर के सर्वकालिक महान खिलाड़ी हैं। रिटायर होने के बाद अन्य क्रिकेटर्स की तरह वे भी एयरकंडीशन स्टूडियों में बैठकर कमेंट्री करते, क्रिकेट पंडित बनकर पैसा कमा सकते थे, लेकिन द्रविड़ तो द्रविड़ हैं। अब वो भारतीय क्रिकेट की नई पौध तैयार कर रहे हैं। अपनी देखरेख में अंडर-19 और इंडिया 'ए' की टीम सजा रहे हैं। पसीने से तरबतर होकर युवाओं का खेल निखार रहे हैं। राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी के निदेशक का पद सुशोभित कर रहे हैं। वैसे तो किसी भी क्रिकेटर की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। वैसे तो कपिल के बाद सुनील आए। सुनील के बाद सचिन। सचिन के बाद विराट, लेकिन दुनिया शायद ही दूसरा राहुल द्रविड़ देख पाएगी।