आज के समय में रणजी ट्राफी खेलना किसी भी क्रिकेटर की किस्मत पलटने जैसा है, लेकिन 2000-01 में पंजाब के लिए रणजी खेलने वाले बबबू कुमार के साथ ऐसा नहीं हुआ था। बाएं हाथ का यह स्पिनर रेहड़ी चलाकर पंजाब के लिए रणजी खेला, लेकिन इतने ऊंचे दर्जे की क्रिकेट खेलने के बावजूद बबलू को पंजाब में एक अदद नौकरी नहीं मिली। नतीजन उन्हें फिर रेहड़ी चलानी पड़ी। हारकर वह नौकरी की तलाश में दिल्ली चले आए। यहां उन्होंने जनता फ्लैट में रहकर नौकरी की और क्रिकेट भी खेली।
बावजूद इसके किस्मत नहीं पलटी, लेकिन बबलू का क्रिकेट खेलना आखिर उनके लिए वरदान बन ही गया। दोस्तों की मदद से वह 15 लाख रुपये के पैकेज में पंजाब रणजी टीम के चयनकर्ता बन गए। फिर क्या था कभी रेहड़ी चलाने वाले बबलू ने कार खरीदकर अपने माता-पिता के सपने को पूरा कर दिया।
जनता फ्लैट में रहकर काट रहे थे जीवन
पटियाला के बेहद गरीब परिवार के बबलू ने पंजाब के लिए पांच रणजी मैच खेले और 18.68 के बेहतरीन औसत के साथ 19 विकेट भी झटके। उनका सर्वश्रेष्ठ 5/48 रहा। बावजूद इसके उन्हें आगे खेलने का मौका नहीं मिला। 42 साल के बबलू के मुताबिक उस वक्त उन्हें नौकरी की सख्त जरूरत थी, लेकिन रणजी खेलने के बावजूद उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली। एक समय हारकर उन्हें फिर रेहड़ी चलाने को मजूबर होना पड़ा, लेकिन उन्हें हार नहीं मानीं। दिल्ली यह सोचकर आ गए कि क्रिकेट भी खेलेंगे और नौकरी भी तलाशेंगे। यहां उन्हें एक निजी कंपनी में 10 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी मिल गई। वह नोएडा के एक जनता फ्लैट में रहकर जैसे-तैसे जीवन काट रहे थे।
रीतिंदर सोढी, भूपिंदर सिंह ने बदली किस्मत
बबलू बताते हैं कि एक दिन उनके क्रिकेटर दोस्त प्रदीप चावला का फोन आया कि पंजाब ने चयनकर्ताओं की जगह निकाली है तुम आवेदन कर दो। बबलू को लगा उन्हें कौन पूछेगा, लेकिन चावला के जोर देने पर उन्होंने आवेदन कर दिया। यहां उनका इंटरव्यू पंजाब क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन देश के पूर्व क्रिकेटर भूपिंदर सिंह सीनियर और रीतिंदर सिंह सोढी ने लिया। दोनों उन्हें अच्छी तरह जानते थे और उनके खेल से भी वाकिफ थे।
इन दोनों और पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजिंदर गुप्ता की वजह से वह पंजाब के रणजी चयनकर्ता चुन लिए गए। 15 लाख का पैकेज सुनकर ही उनके होश उड़ गए। लेकिन उन्हें खुशी है कि उनके चयनकर्ता बनने के बाद पंजाब रणजी टीम लंबे समय बाद नॉक आउट में पहुंची है।
माता पिता से कहा था एक दिन खरीदूंगा कार
बबलू याद करते हैं कि जब वह रेहड़ी चलाते थे तो अपने माता-पिता से कहते थे कि देखना एक दिन उनका ये बेटा उन्हें कार खरीदकर दिखाएगा। हालांकि यहां के संघर्ष में यह यादें धुंधला चुकी थीं, लेकिन चयनकर्ता बनने के बाद उन्हें जब पैसा मिला तो उन्होंने एक छोटी कार खरीदकर अपने माता-पिता का सपना पूरा किया है।