sachin tendulkar retirement
सचिन लिखते हैं कि 16 नवंबर 2013 को मैदान पर अंतिम दिन उन्हें अच्छी तरह याद है। वह इस दिन के आने के बारे में लंबे समय से सोच रहे थे लेकिन अपने आपको पवेलियन की ओर जाने वाली अंतिम पदयात्रा के लिए तैयार नहीं कर पा रहे थे। इस दौरान जैसे-जैसे वह कदम आगे बढ़ा रहे थे, उन्हें लग रहा था कि उनकी श्वांस नलिका में कोई गांठ पड़ती जा रही हो। यह डर था उनके करियर के समाप्त होने का। उनके दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था। वह संघर्ष नहीं करते हुए इसे अंदर नहीं रख पाए और पूरी दुनिया के सामने उन्होंने इसे सामने लाकर रख दिया। अपनी भावनाओं को बाहर लाकर उन्होंने उस वक्त अपने आपको मजबूत महसूस किया।
उन्होंने उस वक्त इसे अपना पौरुष महसूस किया। सचिन लिखते हैं कि अपने आंसुओं को छुपाने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए। फिर उस अंश को कैसे छुपाया जा सकता है जो आपको मजबूत बनाता है। अपने आंसुओं को क्यों छुपाना? अपने दर्द और संवेदनशीलता को दिखाने के लिए भी बहुत साहस की जरूरत होती है, लेकिन यह जरूर होना चाहिए हर सुबह की तरह अपने को मजबूत और बेहतर बनाएं, इस लिए वह सभी पुरुषों को इन बीते हुए रूढ़िवादी अभिप्रायों से निकलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वह कहीं भी हों जहां भी हों अपने अंदर यह साहस लेकर आएं।