अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क ने कहा है कि कप्तान के रूप में उनका काम सिर्फ ऑस्ट्रेलिया को जीत दिलाना था, किसी से दोस्ती करना नहीं।
2003 में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाले क्लार्क की कप्तानी का दौर काफी उथल-पुथल भरा रहा। रिकी पोटिंग के संन्यास लेने के बाद कप्तान बनाए गए क्लार्क को टीम के साथी खिलाड़ियों से तालमेल बनाने में वक्त लगा। कभी-कभी उनके फैसले से साथी खिलाड़ी नाराज भी हुए, लेकिन उन्होंने सिर्फ टीम की जीत परवाह की, दोस्तों की नहीं।
क्रिकबज को दिए एक इंटरव्यू में जब क्लार्क से पूछ गया कि क्या आपने कप्तानी के दौर में दोस्तों को खोया था। इस पर क्लार्क ने कहा कि एक कप्तान के रूप में आपको कठिन फैसले लेने पड़ते हैं। जब आप ऐसा करते हैं, तो निर्णय से कुछ लोगों को मदद मिल सकती है और अन्य को नहीं।
क्लार्क ने कहा कि जब तक आप टीम के हित में निर्णय ले रहे हैं, तब तक ही लोगों को इसका सम्मान करना चाहिए। हां, कई बार आप कप्तान के रूप में कुछ फैसले लेते हैं जिसे कुछ लोग पसंद नहीं करते। इससे मेरी दोस्ती को भी नुकसान हो सकता है। लेकिन, मेरा काम दोस्त बनाना नहीं है बल्कि ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट को दुनिया के नंबर 1 बनाना था।
उन्होंने आगे कहा कि बदकिस्मती से जब मैंने ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी संभाली तब हमारी टीम दुनिया में 5वें नंबर पर थी। किस्मत से मैं दोबारा टीम को नंबर 1 पर लाने में कामयाब रहा। अगर इस दौरान मेरे कुछ दोस्त छूटे हैं, तो मुझे पता है कि मैंने अपना काम किया है।
गौरतलब है इस समय भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट मैचों की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी सीरिज खेली जा रही है। माइकल क्लार्क इस समय भारत आए हुए हैं। वह इस श्रृंखला में कमेंटरी टीम का हिस्सा हैं।