मैं बचपन में मोहल्ले के लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती थी। शुरुआती दिनों में मैं बेहद धीमी गेंदबाजी करती थी, जिस कारण कोई भी लड़का आसानी से मेरी गेंदों पर चौके-छक्के लगा देता था।
लड़के मेरा मजाक उड़ाते। जिस टीम की ओर से मैं खेलती, उसके सदस्य मुझे यह कहकर चिढ़ाते कि तुम न खेलो, नहीं तो हम हार जाएंगे। लड़कों की यही बातें मेरे दिल को चुभ गईं और मैंने तय कर लिया कि मैं लड़कों की बराबर गति से गेंदबाजी करके दिखाऊंगी।
पिता को मुश्किल से मनाया
क्रिकेटर बनने का ख्वाब लिए जब मैं अपने पिता के पास पहुंची, तो उनका साफ कहना था कि तुम अभी 13 साल की हो और तुम्हें अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन मेरी जिद के आगे उनकी एक न चली।
नदिया में लड़कियों के लिए क्रिकेट प्रशिक्षण की व्यवस्था न होना भी एक बड़ी चुनौती था, लिहाजा मैंने कोलकाता की एक एकेडमी से जुड़ने का फैसला किया।
कोलकाता जाकर ट्रेनिंग लेने की बात को लेकर मेरे घरवालों के मन में कई आशंकाएं थीं। फिर यह तय हुआ कि मैं हफ्ते के तीन दिन क्रिकेट की ट्रेनिंग लूंगी, और तीन दिन केवल पढ़ाई करूंगी।
मैं कोलकाता के लिए सुबह पांच बजे की ट्रेन पकड़ती थी, क्योंकि मुझे साढ़े सात बजे हर हाल में क्रिकेट अकादमी पहुंचना होता था। और घर वापस होकर स्कूल जाती थी।
ट्रेनिंग और चार घंटे से ज्यादा के सफर की वजह से मैं थक जाती, लेकिन इसी ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से और मजबूत बनाया। लगभग छह फुट की मेरी लंबाई ने तेज गेंदबाज बनने में मेरी मदद की।
जब घंटों घर के बाहर खड़ी रही
जब मैं क्रिकेट की वजह से मशहूर हो रही थी, तब भी घर वालों को मेरी चिंता थी। एक दिन जब मैं देर से घर पहुंची, तो नाराजगी के कारण मां ने घर का दरवाजा नहीं खोला। मैं घंटों तक बाहर खड़ी रही। अगली बार बिना बताए ऐसा न करने की शर्त पर मां-बेटी में सुलह हुई।
इंग्लैंड से विशेष संबंध
बंगाल की अंडर-19 महिला टीम में जगह बनाने के बाद अट्ठारह वर्ष की उम्र में मैंने इंग्लैंड के खिलाफ पहला टेस्ट मैच खेला। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों का मेरा आगाज भी अंग्रेज टीम के खिलाफ ही हुआ। इंग्लैंड के खिलाफ एक मैच में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद लोग मुझे नदिया एक्सप्रेस कहने लगे।
महिला वनडे क्रिकेट में दो सौ विकेट लेने वाली पहली खिलाड़ी के साक्षात्कारों पर आधारित।