अगर भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आता तो शायद ऐसा नही होता। अब आईपीएल के नए गर्वनर होंगे पूर्व क्रिकेटर ब्रजेश पटेल। गांगुली को उनके साथ मिलकर इसे साफ सुथरा बनाने की नीति बनानी चाहिए। अभी कुछ दिन पहले ही तमिलनाडु प्रीमियर लीग और कर्नाटक प्रीमियर लीग में भ्रष्टाचार के मामले सामने आए। 100 प्रतिशत तो कहीं भी सही नहीं होता लेकिन कुछ तो करना होगा।
सौरव गांगुली की टीम में परिवारवाद जमकर हावी है। बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के भाई कोषाध्यक्ष हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह के सुपुत्र जय शाह सचिव हैं। इनके बीच सौरव गांगुली कैसे काम कर सकेंगे।
ऐसे में यह सवाल भी उठा कि क्या आने वाले समय में वह बंगाल में बीजेपी का चेहरा होंगे, हालांकि गांगुली ने इससे इनकार किया। भारत में और खासकर क्रिकेट में राजनीति अपना रोल इतना अदा करती है कि तो यह कहना इसमें कोई एंगल नहीं है कहना मुश्किल है, लेकिन अगर क्रिकेट पर ध्यान दे तो सौरव गांगुली के पास केवल दस महीने है और वह किस तेजी से अपने निर्णय लेते है वह देखना होगा।
अब अगर क्रिकेट से जुडे राज्य संघों की बात हो तो उसमें अधिकतर पूर्व पदाधिकारियों के रिश्तेदारों का अधिपत्य है। पूर्व अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के बेटी के नाम तक शामिल है। एक्सपर्ट का मानना है कि सौरव गांगुली खुद कप्तान रह चुके हैं, वह इनसे निपटना खूब जानते हैं।
सबसे बड़ी बात बीसीसीआई को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना। इसे लेकर अयाज मेमन मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में बीसीसीआई पर बहुत दाग लगे हैं और उसे नई टीम के लिए भी आसान नही होगा, लेकिन अगर सौरव गांगुली जैसा इंसान बीसीसीआई का अध्यक्ष बनाता है तो सबकी उम्मीदें उनसे होंगी ही। वह न सिर्फ खिलाड़ी और कप्तान रहे हैं।
वह भले ही जगमोहन डालमिया जैसे व्यवसायी या चार्टर अकाउंटेंट ना हों लेकिन व्यवसाय और वित्त को अच्छी तरह समझते है। अच्छी बात यह है कि पहली बार कोई नामचीन क्रिकेटर बीसीसीआई का अध्यक्ष बनेगा, और लोढ़ा समिति भी यही चाहती थी कि क्रिकेटरों का बोलबाला बीसीसीआई में हो।
तो कुल मिलाकर कई चुनौतियां सौरव गांगुली के सामने है। सबको साथ लेकर चलना और वह भी केवल 10 महिनों के लिए यह उनके लिए समय के खिलाफ रेस की तरह है। अपने साथियों में दादा के नाम से मशहूर सौरव गांगुली क्रिकेट की नई पिच पर कितनी दादागीरी दिखा पाते है समय बताएगा।