पुलिस ने श्रीसंत, अजीत चंदीला, अंकित चव्हाण व अन्य पर मकोका लगाया था। जल्दबाजी में उठाए गए इस कदम का हश्र तो ऐसा होना ही था।
राजधानी के कानून विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट में मामला पहुंचते ही इन पर से मकोका हटना तय है।
अधिवक्ता कृष्ण नोटियाल ने बताया कि मकोका लगाने के लिए खास कारण होना चाहिए।
इस कानून को सिंडीकेट के जरिए जबरन वसूली, फिरौती के लिए अपहरण, धमकी, उगाही जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया था।
दिल्ली पुलिस ने जिस प्रकार इस मामले में यह कानून लागू किया, उससे पहले दिन से ही पुलिस की भूमिका संदिग्ध लग रही थी।
पुलिस ने दाऊद व छोटा शकील का नाम जरूर लिया लेकिन उसे साबित नहीं किया।
संगठित अपराध को साबित करना काफी मुश्किल होता है। इतना ही नहीं मामले में अमानत में खयानत का भी अपराध साबित करना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।
वहीं, अधिवक्ता नीरज का मानना है कि मकोका के लिए खास प्रावधान है। इस मामले में फिक्सिंग का आरोप है जो साबित नहीं हो सकता।
जहां तक बात संगठित अपराध की है तो इन खिलाड़ियों ने न तो किसी को धमकाया है और न की कोई उगाही की। ऐसे में इन खिलाड़ियों पर मकोका कैसे लग सकता है।